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आत्मग्लानि

Disclaimer यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है। रात के 9 बज रहे थे, वो अपने कमरे में बेचैनी से इधर-उधर टहलते हुए लगातार किसी को फोन लगा रहा था। शायद किसी ने फोन उठाया नहीं इसलिए उसने मोबाईल को गुस्से में बेड पर पटक दिया। मोबाईल गिर के अभी एक जगह पर रुक भी नहीं पाया था कि उसने फिर से उसे उठाया और किसी को मैसेज किया। मैसेज करके मोबाईल को हथेली पर मारने लगा, मानो ऐसा करने से उसमें से रिप्लाई निकल आएगा। फिर वो अचानक से रुका और मोबाईल को जींस की जेब में रखकर भागा जैसे कुछ याद आ गया हो। बाहर जाकर बाइक पर बैठा और सीधे एक रेस्टॉरेंट पहुँचा। रेस्टॉरेंट के अंदर जाकर उसने एक आदमी से पूछा, "क्या मैं यहाँ के मालिक से बात कर सकता हूँ?" '"मैं ही यहाँ का मालिक हूँ, बताइये?" "वो दरअसल..." उसने अपनी बात पूरी करने से पहले एक मेज़ पर से मेनू उठाया और उसके आखिरी पेज पर बिलकुल नीचे उंगली रखी जहाँ काफी छोटे फॉन्ट में एक लाइन लिखी थी, "अगर आपके टूटे दिल का हाल सुनने वाला कोई नहीं है तो, इस्तक़बाल!" "इसका क्या मतलब है?" "आपको क्या लगता है?" "मुझे ल...