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आत्मग्लानि

Disclaimer

यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।


रात के 9 बज रहे थे, वो अपने कमरे में बेचैनी से इधर-उधर टहलते हुए लगातार किसी को फोन लगा रहा था। शायद किसी ने फोन उठाया नहीं इसलिए उसने मोबाईल को गुस्से में बेड पर पटक दिया। मोबाईल गिर के अभी एक जगह पर रुक भी नहीं पाया था कि उसने फिर से उसे उठाया और किसी को मैसेज किया। मैसेज करके मोबाईल को हथेली पर मारने लगा, मानो ऐसा करने से उसमें से रिप्लाई निकल आएगा। फिर वो अचानक से रुका और मोबाईल को जींस की जेब में रखकर भागा जैसे कुछ याद आ गया हो। बाहर जाकर बाइक पर बैठा और सीधे एक रेस्टॉरेंट पहुँचा। रेस्टॉरेंट के अंदर जाकर उसने एक आदमी से पूछा, "क्या मैं यहाँ के मालिक से बात कर सकता हूँ?"

'"मैं ही यहाँ का मालिक हूँ, बताइये?"

"वो दरअसल..."

उसने अपनी बात पूरी करने से पहले एक मेज़ पर से मेनू उठाया और उसके आखिरी पेज पर बिलकुल नीचे उंगली रखी जहाँ काफी छोटे फॉन्ट में एक लाइन लिखी थी, "अगर आपके टूटे दिल का हाल सुनने वाला कोई नहीं है तो, इस्तक़बाल!"

"इसका क्या मतलब है?"

"आपको क्या लगता है?"

"मुझे लगता है कि जिनके पास अपना दुख बांटने वाला कोई नहीं है वो यहाँ आकर अपना दुख बांट सकते हैं।"

"बिलकुल सही।"

"मैं बात करना चाहता हूँ, बहुत कुछ कहना चाहता हूँ, मैं मर रहा हूँ अंदर से।"

"रेस्टॉरेंट 9:45 पर बंद होता है और हम बात करना 10 बजे शुरु करते हैं। अभी सवा 9 हो रहा है, 45 मिनट वेट कर लो।"

"ठीक है, मैं यहीं बैठ जाता हूँ आप एक कैपेचीनो भिजवा दीजिए।"

"ओके!"

रेस्टॉरेंट का मालिक चला ही होता है कि वो लड़का पूछता है, "यह बात सुनने की फीस क्या है?"

मालिक हँसकर कहता है, "कोई फीस नहीं है, बातों के बदले बातें हैं, दर्द सुनाने के बदले दूसरों का दर्द सुनना है, बस।" वो सही से समझ नहीं पाया पर उसने सहमती में सिर हिला दिया।

इंतज़ार के दौरान उसने नोटिस किया कि यह रेस्टॉरेंट पहले फ्लोर पर था, आधा बंद आधा खुला हुआ। वो खुले वाले हिस्से में बैठा था, जहाँ काउंटर भी था। फिर उसने नज़र घुमाई, किसी टेबल पर दोस्त बैठे थे, किसी पर कपल और किसी पर फैमेली, बस एक वो ही अकेला था। धीमी आवाज़ में टीवी पर 'जब हैरी मेट सेजल' का 'सफर' बज रहा था, "सफर का ही था मैं सफर का रहा, इधर का ही हूँ न उधर का रहा।"

कानो पर हाथ रखकर उसने मेज़ पर सिर रख दिया मानो गाने के यह बोल उसके कानो में चुभ रहे थे। फिर वो तब उठा जब वेटर ने कॉफी लाकर दी। कॉफी पीकर खत्म की तो 9:40 हो गया था, इस दौरान उसने एक बार भी अपने फोन को नहीं देखा, शायद उसे पता था कि कोई कॉल या मैसेज नहीं आने वाला या शायद उसने मोबाईल ऑफ ही कर लिया था। 9:45 हुआ रेस्टॉरेंट बंद होना शुरु हुआ, सभी कस्टमर जा चुके थे। 9:55 पर सारा स्टाफ भी चला गया। अचानक बाहर से चार लोग आये और उन्होंने खुले वाले हिस्से में 6 कुर्सियों से एक गोला बनाया और उन पर बैठ गए। तभी रेस्टॉरेंट का मालिक उस लड़के के पास आया और बोला, "आओ, चलो।"

दोनों जाकर खाली पड़ी दो कुर्सियों पर बैठ गए। सन्नाटा हो चुका था, गाने भी नहीं बज रहे थे। कैश काउंटर के पीछे वाली दीवार पर लगी एक पुराने ज़माने की घड़ी ने 10 बजते ही घंटे बजा कर सन्नाटे को कुछ ऐसे चीर दिया जैसे कुल्हाड़ी का एक तेज़ वार लकड़ी को चीर देता है।

लड़का घंटे की आवाज़ सुनकर झिझक गया, वो सम्भल पाता उससे पहले ही मालिक ने कहा, "हाँ तो आज हमारे साथ एक नए मेम्बर हैं, अपना परिचय दीजिए।"

"जी, जी वो...मेरा नाम अंकुर है, मैं 22 साल का हूँ और मैं बीटेक के फाईनल ईयर में हूँ।" दो पल रुककर वो आगे बोला, "इतना काफी है?"

"हाँ काफी है।"

"तो क्या मैं यहाँ कोई भी बात शेयर कर सकता हूँ?"

"बिलकुल, जो दिल में है सब कहो। बिना जज होने के डर के।"

"ओके! तो...मैने उससे बात करने की बहुत कोशिश करी कि मुझसे गलती हो गई पर वो कुछ सुनने को राज़ी ही नहीं है। हर जगह से ब्लॉक करके मुझे जैसे गायब सी हो गई है।"

"एक मिनट एक मिनट, ऐसे किसी के कुछ समझ नहीं आयेगा। शुरु से बताओ कि कब, क्या और कैसे हुआ।"

"शुरु से?" यह सवाल करते हुए उसके चेहरे पर ऐसे भाव आ गये थे मानो रेस्टॉरेंट के मालिक ने उससे समय में पीछे जाकर वो सब फिर से जीने के लिए कह दिया हो। उसने 2 सेकण्ड रुक कर गहरी साँस ली और बोलना शुरु किया।


"ओके तो...8th तक मैं अलग स्कूल में पढ़ा था और 9th से मैं एक नये स्कूल में आ गया। सब कुछ अचानक बदल गया था, दोस्त छूट गए, 8 साल तक जिस स्कूल बिल्डिंग को रोज़ देखा वो अब नहीं दिखने वाली थी। यहाँ मुझे फिर से एक नई शुरुआत करनी थी, नये दोस्त बनाना थे, टीचरस् की नज़र में आना था, इस स्कूल का हर कोना पहचानना था। यह सब शायद हो भी जाता अगर पहले ही दिन मुझे वो न दिखती, या दिखती तो अगर मैं उसे देखता न रह जाता, या देखता रह जाता तो वो मुझे न देखती पर यह सब हो गया। वो दिख गई, मैं देखता रह गया और उसने भी देख लिया। 'अकांक्षा' नाम था उसका, वो 1st क्लास से पढ़ रही थी वहाँ, सब उसे जानते थे पर शायद वैसे नहीं जैसे मैने उसे जाना।

एक लड़की जो स्कूल की बोरिंग सी यूनीफॉर्म में, दो चोटी बनाये हुए भी इतनी खूबसूरत लगती थी कि मेरी आज तक देखी हुई हर बेइंतेहा सजी लड़की भी उसके सामने फीकी लगे। काले बाल जिनकी लम्बाई मुझे नहीं पता थी क्योंकि वो हमेशा बंधे रहते थे, भूरी आँखें जिनका सहारा वो अपनी बात मनवाने के लिए लेती थी, गुलाबी होंट जिनको वो सोचते वक्त तरह-तरह के आकार देती थी और बच्चो जैसी मुस्कराहट। जब मुस्कराती थी तो पता नहीं क्यों हल्के से अपने नीचे वाले होंट को काटती थी, पर जो भी करती थी बहुत प्यारी लगती थी।

स्कूल चालू हो चुका था, पढ़ाई चल रही थी और किसी न किसी बहाने उससे बात भी हो जाती थी। धीरे-धीरे बातों ने दोस्ती का रूप ले लिया पर मेरा मन दोस्ती से ज़्यादा कुछ चाहता था। क्या? यह मुझे भी उस वक्त नहीं पता था, बस मन होता था कि उससे बात करता रहूँ, उसे रह-रह कर देख लूं। उसे देखना बिलकुल ऐसा था जैसे ऑप्टिकल इल्यूज़न, जिनको आप समझ नहीं पाते पर फिर भी देखते रहना चाहते हैं और समझना चाहते हैं कि इसकी शुरुआत कहाँ है और अंत कहाँ है।

खैर 9th और 10th तो ऐसे ही निकल गए। 11th आते ही सबके हॉरमोंस अचानक चरम पर पहुँच गए। प्यार, मोहब्बत, क्रश और प्रपोज़ल की बातें होने लगी। इसी बीच 7 फरवरी आयी, उस दिन रोज़ डे था। हम सब बातें कर रहे थे कि कल प्रपोज़ डे है देखते हैं कौन किसको प्रपोज़ करेगा। "अगर मुझे किसी ने मज़ाक में भी प्रपोज़ किया न तो मैं उससे कभी बात नहीं करूंगी, मुझे यह सब बिलकुल पसंद नहीं है।" अकांक्षा ने ऐलान किया।

मेरा छोटा सा दिल जैसे मेरे सीने में और ज़्यादा दुबक गया। लेकिन सबसे ज़्यादा हंसी की बात तो यही है कि अगले दिन उसे एक शुभम नाम के लड़के ने प्रपोज़ किया और उसने एक्सेप्ट कर लिया।

उस दिन मुझे समझ आया कि लड़की के शब्दों को नहीं भावनाओं को समझना होता है, पर अब देर हो चुकी थी। देर हो चुकी है यह मुझे पता था पर मेरे दिल को नहीं। वो तो कह रहा था कि यह चार दिन का अफेयर है, खत्म हो जाएगा। 11th खत्म हो गया, 12 खत्म हो गया लेकिन वो चार दिन का अफेयर खत्म नहीं हुआ।

9th 10th मैंने सिर्फ उसे देखते हुए गुज़ारे और 11th 12th उसके साथ शुभम को। मैं देवदास नहीं था लेकिन जब भी उन दोनों को साथ देखता था तो सोचता था, "शुभम क्यों? मैं क्यों नहीं?" कई बार इस दूसरे क्यों पर इतना ज़्यादा ज़ोर दे देता था कि सीने में दर्द महसूस होता था।

12th की फेयरवेल थी, मैंने वो करने का सोचा जो मैंने पिछले चार साल में नहीं किया था। मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल, जिसकी वजह से मैं आज यहाँ आप लोगों के बीच बैठा हूँ, उसे अपनी फीलिंग्ज़ बताना।

पार्टी लगभग खत्म हो गई थी, सब घर जाने ही वाले थे। मैंने अकांक्षा को एक साइड में बुलाया और उससे कहा, "मैं तुम्हें कुछ बताना चाहता हूँ, हालांकि यह अब बताने का कोई मतलब नहीं है पर मैं तुम्हें बहुत पसंद करता हूँ, नहीं-नहीं पसंद नहीं करता। पसंद तो 9th में करता था, अब प्यार करता हूँ। मुझे मालूम है तुम शुभम के साथ हो और मैं तुम्हारे लिए खुश भी हूँ लेकिन बस आज न जाने क्यों ऐसा लगा कि तुम्हें आखिरी बार देख रहा हूँ तो बता दूँ।"

मैं चुप गया, वो कुछ नहीं बोली, बस देखती रही, सीधे मेरी आँखों में। उसकी नज़र मुझे तीर की तरह चुभ रही थी और हमारे बीच की खामोशी, वो तो कुछ ऐसी थी कि लग रहा था जैसे सदियाँ गुज़र गई हैं और कोई कुछ नहीं बोला। वो कुछ सोच रही थी पर आज न उसकी आँखें छोटी हुईं और न होंठों ने टेढ़े-मेढ़े आकार लिए। मैं चल दिया, उसने आवाज़ दी, "अंकुर"। उसके मुंह से अपना नाम सुनकर अपने होने पर गर्व सा होता था। मैं मुड़ा और वो बोली, "हम दोस्त हैं और तुमने मुझे यह बताकर अपनी दोस्ती का मान रखा है।" मैंने अपने दोनों होंठों को अंदर की तरफ भींच कर एक अजीब सी मुस्कराहट दी और चल दिया।

बोर्ड इक्ज़ैम में लड़कियों का होम सेंटर था और लड़को का नहीं, यह जानकर मुझे लगा फेयरवेल सचमुच आखिरी मुलाकात थी पर मैं गलत था। कोई भूत शायद जल्दी पीछा छोड़ दे पर यह प्यार जल्दी पीछा नहीं छोड़ता।

मैं बीटेक करने एक प्राइवेट यूनीवर्सिटी में आ गया, अभी 15-20 दिन ही गुज़रे होंगे कि मैंने कैन्टीन में अकांक्षा को देखा। डेनिम जीन्स, पीली फ्लोरल कुर्ती और खुले बालों में वो आज पहले से भी ज्यादा खूबसूरत लग रही थी। मन हुआ भाग के जाऊं उसके पास और बात करूं पर फिर जाने क्या सोचकर रुक गया। वापस मुड़ता उससे पहले उसने देख लिया और मेरा नाम चिल्लाती हुई वो मेरे पास आयी, "अंकुर, तुम यहाँ!"

ऐसा लगा जैसे उसको मुझे देखकर बहुत खुशी हुई, और मुझे यह सोचकर बहुत खुशी हुई पर फिर बात होना शुरु हुई तो पता चला कि वो इसलिए खुश है क्योंकि इस नये कॉलेज में कोई जानने वाला दिख गया। आगे उसने बताया कि शुभम दिल्ली चला गया है 'ऐवियेशन' का कोर्स करने और वो यहाँ से 'फैशन डिज़ाईनिंग' कर रही है। मुझे समझ नहीं आ रहा था मैं उसकी यहाँ मौजूदगी से खुश होऊं या दुखी?

दिन गुज़र रहे थे, कभी-कभी कैंटीन में मिलना हो जाता था उससे। ऐसे करते-करते सेकण्ड ईयर आ गया। एक दिन मेरे क्लास की एक लड़की, निधि ने मुझसे प्यार का इज़हार किया। यह नहीं कहूंगा कि अंकाक्षा के अलावा मैंने किसी को देखा नहीं था पर हाँ प्यार फील हो किसी को देखकर ऐसा भी नहीं हुआ था। तो अब मैंने सोचा जब प्यार खुद चलकर आ रहा है तो इसे एक मौका दिया जाये, सो मैंने हाँ कर दी। सच बताऊं मुझे आज तक सही से खुद नहीं पता कि मैंने हाँ क्यों की थी, इसलिए की मैं अपनी ज़िदगी में प्यार को आने देना चाहता था या मुझे पता था कि प्यार न मिले तो कैसा लगता है या मैं अकांक्षा को दिल-ओ-दिमाग से निकालने के लिए कुछ भी करने को तैयार था या मैं अकांक्षा को दिखाना चाहता था कि मैं अकेला नहीं हूँ। खैर जो भी था, हाँ हो चुकी थी और हम गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड बन चुके थे।

मैंने अकांंक्षा से मिलना लगभग बंद कर दिया। निधि मुझे अच्छी लगने लगी थी, वो अकांक्षा जितनी खूबसूरत तो नहीं थी पर,...वेल आई थिंक मेरा यह कहना सही नहीं है क्योंकि क्या पता वो खूबसूरत हो पर मुझे अकांक्षा के अलावा कभी कोई खूबसूरत लगा ही नहीं। खैर जो भी था, मैं अभी उसकी तारीफ में बहुत कुछ कह सकता हूँ पर सबसे अहम बात यह है कि, वो मुझसे प्यार करती थी। मैं फाइनली खुश था, थर्ड ईयर खत्म होने वाला था जब मुझे रियलाइज़ हुआ कि मेरी फीलिंग्ज़ अकांक्षा के लिए तकरीबन खत्म हो गई हैं और मैं निधि के प्यार में हूँ अब।

बीटेक का आखिरी साल चल रहा था, अकांक्षा अपना 3 साल का कोर्स पूरा करके जा चुकी थी। मैं और निधि एक दूसरे के साथ बहुत खुश थे। सब कुछ सही था, नॉरमल था और फिर एक शाम मुझे एक अननोन नंबर से कॉल आया। मैंने रिसीव किया तो दूसरी तरफ अकांक्षा के रोने की आवाज़ आ रही थी, मुझे उस वक्त रियलाईज़ हुआ कि अब मेरे मोबाईल में अकांक्षा का नंबर तक सेव नहीं है। मैंने बात करने की कोशिश की पर उससे बोला नहीं जा रहा था। वो बस इतना बोली, "मुझसे मिलने आ सकते हो अभी मेरे घर, आई नीड यू।" मैंने बाइक उठाई और सीधे उसके घर गया, क्यों गया? पता नहीं, बस चला गया। उसके घर के सामने पहुँच कर मैंने बाईक रोकी तो आँखों के सामने अचानक स्कूल टाईम का फ्लैशबैक चलने लगा जब मैं इस सड़क के हज़ार चक्कर लगाता था। हज़ार चक्कर बस एक झलक पाने के लिए, क्योंकि स्कूल में तो वो हमेशा यूनीफॉर्म में दिखती थी पर अपनी बालकनी में घर वाले कपड़ों में दिख जाती थी और शायद आप लोग मेरी यह भावना समझ पायें कि वो लड़की जो आपको पसंद हो, उसे अलग-अलग तरह के कपड़ों में देखना, खुले और गीले बालों में देखना, स्कूल के अलावा कहीं और देखना, स्कूल टाईम से हटकर यानी शाम या रात के वक्त देखना, कितना एक्साइटिंग था। एक बार मैं अपनी साईकिल पर ऐसे ही उसके घर के सामने खड़ा था तो वो बालकनी में आयी और उस दिन उसने भी मुझे देख लिया और बिना आस-पडो़स वालो के डर के चिल्लाई, "तुम यहाँ क्या कर रहे हो?" मेरे दिमाग़ में यह फ्लैशबैक चल ही रहा था कि आवाज़ आयी, "तुम वहाँ क्या कर रहे हो? ऊपर आओ न।" मैं झिझका और उसे हाथ दिखाकर बाईक साईड लगाई।

अंदर गया तो पाया कि वो घर पर अकेली थी। आज वो काले रंग की सादी कुर्ती पहने थी, उसमें उसका चाँदी सा रंग बेहद खिल रहा था और उसके काले खुले बाल तो हमेशा से मेरे सुकून के लिए मुसीबत ही रहे हैं। हम बैठ गए और बातें होने लगी। पहले तो उसने यह बताया कि शुभम से उसकी लड़ाई हो गई है और वो उससे ब्रेकअप करके दिल्ली से वापस आ गई है। मुझे तो यह पता तक नहीं था कि वो दिल्ली में थी इस दौरान। फिलहाल, यह सब बताने के बाद उसने जो-जो बातें बोली, वॉट डू आई इवेन से! वो बोली, "ऐसा लग रहा है 7 साल बर्बाद हो गए मेरे, कितने गलत इंसान के साथ थी मैं। तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बता दिया था कि तुम मुझसे प्यार करते थे, मैं तुम्हें ज़रूर हाँ कर देती, तुम मुझे पसंद थे। या काश! फेयरवेल के टाईम शुभम मेरा बॉयफ्रेंड न होता तब भी मैं हाँ कह देती, पर मेरी किस्मत।" यह सब और इससे भी ज़्यादा जाने क्या-क्या बोलकर वो रोती रही, और मैं उसकी बातें सुनकर सुन्न पड़ता चला गया। मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन पाताल सब खिसक चुका था। 

जब किसी इंसान का दिल दुखा हो तो उसकी बातों को सिर्फ सुनो, दिल पर मत लो। यह बात मुझे काफी बाद में समझ आयी क्योंकि उस वक्त तो मैं सब दिल पर ले चुका था। मेरा ऑलमोस्ट खत्म हो चुका प्यार ऐसे वापस जाग गया जैसे किसी ने अंगीठी की आखिरी चिंगारी के खत्म होने से पहले उस पर मिट्टी का तेल उड़ेल दिया हो।

इतनी देर में मैं कुछ बोला नहीं था। मैं सिर्फ सुन रहा था और वो बोल रही थी। हम दोनों बेड पर आमने-सामने बैठे थे, बोलते-बोलते अचानक उसने आगे बड़ कर मुझे इतनी कस के गले लगाया कि बता नहीं सकता, उससे पहले मुझे किसी ने ऐसे गले नहीं लगाया था, निधि ने भी नहीं। आई नो सुनने में अजीब लग रहा है कि जो लड़की प्यार करती है उसने इतनी कस के गले नहीं लगाया जितना इस लड़की ने जो प्यार नहीं करती पर मेरे ख्याल से प्यार में इंसान सामने वाले को फील करने के लिए गले लगाता है पर एक टूटा हुआ इंसान कुछ यूं गले लगाता है कि बस सामने वाले में समा जाए, और अपने सारे ग़म भूल जाए।

मैं अगर मोटा नहीं हूं तो दुबला भी नहीं हूं पर उसकी पकड़ मुझे अपनी पसलियों पर महसूस हो रही थी। एक पल को मुझे लगा यह टूटा हुआ इंसान मुझे तोड़ देगा पर फिर भी मैं उसे पकड़े रहा। करीब 10 मिनट बाद पकड़ ढीली हुई पर वो मुझसे ज़्यादा दूर नहीं हुई, अपने चेहरे को मेरे चेहरे के सामने लाकर उसने अचानक मेरे होंठो को चूमना शुरु कर दिया। सच बताऊं तो मैं पूरी तरह हैरान नहीं था, इसकी उम्मीद थी मुझे और चाहत भी। मैं भी उसे चूमने लगा, उसकी हर चीज़ में इंतेहा थी। मैं चूम रहा था तो वो मेरे होंठो और जीभ को चूस रही थी। मैंने एक कदम और आगे बढ़ाया और अपने आपको आगे खिसका के उसे अपने ऊपर लेते हुए बेड पर लेट गया। इस दौरान हम एक-दूसरे से पल भर के लिए भी अलग नहीं हुए थे। अब दूसरा कदम उसने बढ़ाया और मेरी शर्ट के बटन खोलने की शुरुआत करी, पर किस करते हुए कहाँ दिखना था कि कौन-सा बटन कहाँ है तो उसने दोनों हाथों से मेरी शर्ट को बीच से पकड़ कर कुछ ऐसे खींचा कि सारे बटन टूट कर मोतियों कि तरह बिखर गए। मैं शर्ट के नीचे कुछ नहीं पहने था, शायद इसीलिए वो मेरे होंठो को छोड़कर टोढी, गर्दन, कॉलरबोन से होते हुए मेरे सीने पर पहुँच गई। यह वो वक्त था जब मैं अपना नाम तक भूल चुका था। मैंने भी उसकी कुर्ती के पीछे वाली ज़िप खोल दी और उसने एक झटके में उठकर कुर्ती को उतारकर फेंक दिया। मैं पहली बार उसको इस अवतार में देख रहा था, और यह देखकर मेरे अंदर अगर कोई होश बचा था तो वो भी खत्म हो गया। फिर वो सब हुआ जो सोचा जा सकता है, और मैं फिर से कहूंगा कि उसकी हर चीज़ में इंतेहा थी।

सब कुछ हो जाने के बाद हम दोनों बेड पर लेटे थे, कोई शब्द उस सन्नाटे को खत्म करने की जुर्रत नहीं कर पा रहा था लेकिन फिर वो सन्नाटा खत्म हुआ, मेरे मोबाईल की रिंगटोन के साथ। स्क्रीन पर 'Love' लिखा हुआ था, लव मतलब निधि। अजीब बात है पर उस वक्त मुझे यह ख्याल नहीं आया कि मैंने निधि को चीट किया बल्कि यह आया कि मैं खुद से कितना झूठ बोलता आया हूँ। मेरा प्यार, मेरा लव तो यह है मेरे साथ, तो निधि के लिए मैंने लव क्यों लिख रखा है। मैंने फोन नहीं उठाया, खुद बिस्तर से उठा और अकांक्षा से एक शर्ट मांगी, उसके पास शुभम की एक शर्ट थी वो उसने मुझे दे दी और मैं बिना कुछ कहे वहाँ से चला आया। मैंने उससे कुछ नहीं कहा, आई लव यू भी नहीं  क्योंकि कई बार शब्द सब कुछ बर्बाद कर देते हैं, जो जैसा है वैसा रहने देना चाहिए।

घर आकर मैंने निधि को कॉल की, वही बातें हुई जो रोज़ होती हैं पर आज मैं खोया हुआ था। फिर अचानक उसने कुछ ऐसा कहा कि मैं होश में आ गया, "तुम भूल गए न? आज हमारी दूसरी ऐनीवरस्री है, हमें शाम 8 बजे मिलना था, मैंने कॉल भी की थी पर तुमने उठाई ही नहीं। अब की है तब भी कोई सवाल नहीं कि क्यों करी थी कॉल क्या बात है। मैं तब से वेट कर रही कि अब कुछ बोलोगे।"

यह सुनकर मुझे पहली बार रियलाईज़ हुआ कि ओ शिट! मैंने तो इस लड़की के साथ चीटिंग कर ली है। पेट में उड़ती हुई तितलियाँ अचानक काँटे बन गईं, और वो काँटे मेरे गले में आकर अटक गए, मेरा साँस लेना मुश्किल हो गया।

मैंने बहुत मुश्किल से कहा, "आई विल मेक इट अप टू यू, कल सुबह-सुबह मैं तुम्हें एक रेस्टॉरेंट ले जाऊंगा। ओके?"

वो सुबह जाने से मना करने लगी क्योंकि फाइनल इग्ज़ैम बस एक हफ्ता दूर थे पर मैंने उसे मिलने के लिए मना लिया। मुझे मिलने की जल्दी थी क्योंकि उससे मिलकर सच बोलना चाहता था और बताना चाहता था कि मैं तुम्हारे प्यार को रेसिप्रोकेट कर रहा हूँ पर अकांक्षा वो लड़की है जिससे मैं दिल-ओ-जान से हमेशा से प्यार करता आया हूँ। मुझे गिल्टी फील हो रहा था बहुत हो रहा था लेकिन गिल्ट से ज़्यादा मैं खुश था, मुझे नहीं पता यह गलत है या सही पर मैं खुश था, अपने लिए खुश था। हर इंसान कहीं न कहीं स्वार्थी होता ही है न, और जब बात मोहब्बत की हो तब तो...वेल अगले दिन हम मिले, इसी रेस्टॉरेंट में।

इसी ओपन एरिया में बैठे थे हम, उस कोने वाली टेबल पर।  पहले तो वो अपनी ही बात करती रही फिर मैं मेरी बात कहने के लिए हिम्मत जुटाने 2 मिनट के लिए वॉशरूम गया। जब वापस आया तो देखा वो मेरा मोबाईल लिए बैठी है और उसका चेहरा पीला पड़ गया है मानो खून ने वहाँ पहुँचना बंद कर दिया है। मैं टेबल तक पहुँच ही पाया था कि उसने फोन को मेरी तरफ बड़ाते हुए टेबल पर रख दिया। मैंने बैठते हुए देखा, वो अकांक्षा का मैसेज था, "कल  हमारे बीच जो हुआ प्लीज़ उसे दिल पर मत लेना, मैं बहुत परेशन थी क्योंकि शुभम से लड़ाई हो गई थी पर आज सुबह वो दिल्ली से वापस... "

लॉक स्क्रीन पर इतना ही दिख रहा था, मैंने स्क्रीन अनलॉक करी। मैं एक बार फिर भूल चुका था कि निधि नाम की कोई लड़की भी है इस दुनिया में जो मुझसे प्यार करती है और वो यह जान चुकी है कि मैं किसी और के साथ सोकर आया हूं। मुझे सिर्फ अपनी पड़ी थी, मुझे उस मोमेंट में बस यह जानना था कि अकांक्षा ने पूरी बात क्या कही है, शुभम क्यों आया है दिल्ली से और मैं क्यों दिल पर न लूँ वो जो कल हुआ हमारे बीच।

"वापस आ गया है, उसने मुझसे बहुत माफी माँगी, वो मेरी गोद में सिर रखकर बहुत देर रोता रहा। मैं उससे प्यार करती हूँ और हमेशा करती रहूँगी। यह प्यार बड़ी कमीनी चीज़ है। मुझे मालूम है तुम भी मुझसे प्यार करते हो पर मैं नहीं करती, मुझे माफ कर देना, मैं उसके साथ वापस दिल्ली जा रही हूँ।"

हम दोनों ने मैसेज पढ़कर नज़र मिलाई, दोनों की आँखों में आँसूओं का सैलाब था। दोनों ने इस एक पल में उस शख्स को खो दिया था जिससे वो बेइंतेहा प्यार करते थे, जिसे वो अपना समझने की गलती कर रहे थे, जो किसी और से प्यार करता था। उस वक्त आपकी इस टीवी पर 'मर्डर' का 'दिल को हज़ार बार' बज रहा था, "दिल का बाज़ार है यहाँ तो, दिल को दिलों से बचाना,...दिल को हज़ार बार रोका, रोका, रोका..."

पहले उसकी आँख से आँसू निकला और फिर मेरी। उसने मुझसे कोई एक्सपलेशन नहीं मांगा, मैं भी कुछ नहीं बोला। दोनों बस यूहीं 5 मिनट तक देखते रहे एक-दूसरे को और फिर वो उठ कर चली गई। मैं 15 मिनट और बैठा रहा, उस दौरान ही मैंने आपके इस मेनू कार्ड पर यह लाईन लिखी देखी थी, "अगर आपके टूटे दिल का हाल सुनने वाला कोई नहीं है तो, इस्तक़बाल!"

ऐसे वक्त में हर इंसान अपने दोस्त के पास जाता है पर मैंने आज तक कोई ऐसा दोस्त ही नहीं बनाया जिससे यह बातें की जा सकें। ऐसा नहीं है कि दोस्त नहीं हैं, दोस्त हैं, वॉलीबॉल खेलने वाले, सिगरेट पीने वाले, दारू पीने वाले, मूवी देखने जाने वाले, पॉलिटिक्स डिसकस करने वाले लेकिन दिल की बात करने वाले, नो, नॉट वन। दो दिन कुछ नहीं हुआ, न बात, न कॉलेज और न होश। उसके बाद मुझे अहसास हुआ कि मेरे साथ उतना गलत नहीं हुआ जितना गलत मैंने किया है। मैंने निधि से बात करने की कोशिश की तो पता चला कि वो कॉलेज नहीं आ रही है और मैं सभी सोशल मीडिया अकाउंट से ब्लॉक हूँ यहाँ तक की मेरा नंबर भी ब्लॉक है। मैंने दूसरे नम्बर से कॉल की तो उसने आवाज़ सुनते ही फोन काट दिया। तीसरे नम्बर से करी तो फिर यही हुआ और उसके बाद शायद उसने 'ब्लॉक ऑल अननोन नंबर' वाली सेटिंग ऑन कर दी इसलिए कॉल लगना ही बंद हो गई। मैंने आखिर उसे मेल किया जिसको 2 दिन हो गए हैं पर कोई रिस्पॉन्स नहीं आया। तब से मैंने उसे रोज़ कॉल लगाई कि शायद किसी दिन अनब्लॉक कर दे। आज यहाँ आने से पहले भी मैं उसे कॉल कर रहा था लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ। सोच-सोच कर मेरा दिमाग़ अब फटने लगा है। मैं मानता हूँ मैंने बहुत गलत किया पर मेरा भी दिल टूटा है, बचपन की मोहब्बत ने मुझे इस्तेमाल किया है। मैं शब्दों में कैसे बताऊं मुझे क्या फील हो रहा है। बस यह समझ लीजिए कि बरसो के प्यासे एक शख्स को आखिर पीने को पानी मिला, लेकिन वो ज़हर निकला। अब आप ही बतायें, मैं अपने दिल टूटने का ग़म मनाऊ या आत्मग्लानि से मर जाऊं?"


अंकुर अपनी बात बता कर चुप हो गया, उसकी आँखे गीली थी। बाकी सब गहरी सोच में डूबे हुए थे। मालिक ने चुप्पी तोड़ी, "तुम पूरी तरह गलत भी नहीं हो, पूरी तरह सही भी नहीं हो, पर इम्पॉरटेंट यह नहीं है कि तुम सही हो या गलत, इम्पॉर्टेंट यह है कि तुम चाहते क्या हो? तुम अपना दिल जोड़ना चाहते हो या निधि का?"

"निधि का" अंकुर ने बिना सोचे कहा।

"तो पश्चाताप करो।"

"कैसे?"

"पता नहीं! मैं बस इतना कह सकता हूँ कि पाप जितना बड़ा हो, पश्चाताप उससे थोड़ा सा बड़ा होना चाहिए। तो उससे मिलने या बात करने की कोशिश करते रहो और जब भी वो मिलो तो उससे सच बोलो और कहो कि मैं हर सज़ा के लिए तैयार हूँ और फिर वो जो सज़ा दे उसे मानो।"

"उसने अगर यह कह दिया कि मुझसे आज के बाद कभी न मिलना तो?"

"गुस्से में वो कहेगी, ज़रूर कहेगी, तुम उसे यकीन दिलाना कि गलती तुम्हारी है तो उसे सफर करने की ज़रूरत नहीं है। दूर रह कर तो वो भी सफर करेगी, प्यार करती है न।"

"आई होप शी स्टिल डज़! आई विश आई कुड लव हर लाईक आई लव्ड अकांक्षा। अगर शुरु से हम दोनों सिर्फ एक दूसरे से प्यार करते तो यह न होता।"

यह बात सुनकर एक आदमी बोला, "जो होना होता है वो होकर रहता है, मेरे मामले में हम दोनों को प्यार था पर..."

"पर क्या हुआ?"

वो आदमी कुछ बोल पाता उससे पहले घड़ी ने घंटे बजाकर 11 बजने का ऐलान किया।

मालिक बोला, "क्या हुआ, अब यह कल पता चलेगा आपको, आज का टाईम खत्म।"

"अरे! चलिए कोई बात नहीं। वेल अपना नाम तो बता दीजिए।" अंकुर ने मालिक से पूछा।

"मेरा नाम कच है।"

"कच्छ?"

"कच्छ नहीं कच, क और च कच।"

"माफ कीजिएगा पर यह कैसा नाम है?"

"इसके पीछे लम्बी कहानी है, कल बताता हूँ अभी घर निकलते हैं?"

"हाँ ठीक, यह लीजिए कैपेचीनो के पैसे।"

अंकुर पैसे देकर चला गया, कल फिर से वापस आने के लिए।


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Book    : I have never been (Un)happier Author : Shaheen Bhatt Year.    : 2018 Genre  : Non-Fiction 'I have never been (Un)happier' , this Non-fiction book is basically about depression, but before going into book review let me tell you about the author. Shaheen Bhatt has written this book, Yes I know Bhatt Surname sounds familier, and you guessed it right, she is sister of Alia Bhatt and Daughter of Mahesh Bhatt and Soni Razdan. The reason behind telling you that she is sister of a bollywood star and belong to a well known family is only to clarify that depression can happen to anyone, like literally to anyone. This book does the same thing, it tells you that how a privileged person can also face mental issues and suffer. Shaheen Bhatt has written her experience from begining to the very day, that how her struggle with depression started and how she fought back. This book contains her few handwritten notes and photos but the book itself is not just ...

अनुगच्छतु प्रवाहं

Disclaimer यह एक series की तीसरी कहानी है। Series होते हुए भी हर कहानी को अलग-अलग पढा जा सकता है तथा इस कहानी में लिखे गए सारे स्थान वास्तविक हैं परंतु पात्र तथा घटनाएँ काल्पनिक हैं। कृपया पूरी कहानी पढ़े बिना कोई राय ना बनाएँ। सिकन्दर हर हाल में समुद्र किनारे पहुँचकर Sunrise देखना चाहता था इसलिए Taxi Driver पर चिल्ला रहा था, "अरे यार जल्दी करो, पहुँचा दो दुगुना किराया दे दूँगा बस तुम भगा लो, कोई Shortcut हो तो लेलो।" और Driver हाँ हाँ करके बस हड़बड़ाहट में गाड़ी भगाए जा रहा था तभी अचानक सामने एक आदमी आ गया, Driver ने पूरी जान लगाकर Steering Wheel घुमाया और उस आदमी को बचाया। वो आदमी तो बच गया लेकिन सिकन्दर का सर अचानक किसी चीज़ से टकरा गया। सिकन्दर ड्राइवर पर चिल्लाया, "अबे क्या कर रहा है साले, मारेगा क्या, अगर मैं मर जाता ना, तुझे छोड़ता नही।" "अरे, अचानक सामने पता नही कौन पागल आदमी आ गया" Driver बोला। सिकन्दर जल्दी से उतरा और देखने लगा कि कौन था, बीच रोड पर वो आदमी अभी भी वैसे ही खड़ा हुआ था। सिकन्दर उसके पास गया और बोला, "अरे भाई, ठीक तो हो ...

इससे मुश्किल और क्या हो सकता है?

'इससे मुश्किल और क्या हो सकता है?' यह ऐसा सवाल है जिसके हज़ार जवाब हैं लेकिन जब पूछा जाए तो मिलता एक नहीं। आजकल फैजान इसी सवाल से घिरा हुआ था। उसकी ज़िन्दगी का कुछ ऐसा हाल था कि व...