Disclaimer
यह एक series की तीसरी कहानी है। Series होते हुए भी हर कहानी को अलग-अलग पढा जा सकता है तथा इस कहानी में लिखे गए सारे स्थान वास्तविक हैं परंतु पात्र तथा घटनाएँ काल्पनिक हैं। कृपया पूरी कहानी पढ़े बिना कोई राय ना बनाएँ।
सिकन्दर हर हाल में समुद्र किनारे पहुँचकर Sunrise देखना चाहता था इसलिए Taxi Driver पर चिल्ला रहा था, "अरे यार जल्दी करो, पहुँचा दो दुगुना किराया दे दूँगा बस तुम भगा लो, कोई Shortcut हो तो लेलो।" और Driver हाँ हाँ करके बस हड़बड़ाहट में गाड़ी भगाए जा रहा था तभी अचानक सामने एक आदमी आ गया, Driver ने पूरी जान लगाकर Steering Wheel घुमाया और उस आदमी को बचाया। वो आदमी तो बच गया लेकिन सिकन्दर का सर अचानक किसी चीज़ से टकरा गया। सिकन्दर ड्राइवर पर चिल्लाया, "अबे क्या कर रहा है साले, मारेगा क्या, अगर मैं मर जाता ना, तुझे छोड़ता नही।" "अरे, अचानक सामने पता नही कौन पागल आदमी आ गया" Driver बोला। सिकन्दर जल्दी से उतरा और देखने लगा कि कौन था, बीच रोड पर वो आदमी अभी भी वैसे ही खड़ा हुआ था। सिकन्दर उसके पास गया और बोला, "अरे भाई, ठीक तो हो ना, चोट वोट तो नही लगी?" वो आदमी कुछ बुदबुदाया पर सिकन्दर समझ नही पाया तो सिकन्दर ने दोबारा पूछा, इस बार वो आदमी सही से बोला, "तीसरी बार था यह, तीसरी गाड़ी थी, फिर बच गया, वैसे इतने Accident होते रहते हैं, लोग मरते रहते हैं, मारते रहते हैं अब मरना है तो सबकी इंसानियत जाग गई है।" यह सुनकर सिकन्दर फौरन समझ गया कि यह आदमी Suicide करने निकला है, सिकन्दर ने उसका हाथ पकड़कर Taxi में बिठाया, और Driver से चलने को कहा। सिकन्दर उस आदमी को काबू कर रहा था जो बस भागने की कोशिश कर रहा था, वो आदमी तो बस चलती कार से कूद जाना चाहता था। इस वक्त सिकन्दर की नज़र में दोनो ही चीज़े बराबर मायने रखती थी, इस आदमी की जान भी जो बस मर जाना चाहता था और वो सूरज भी जो बस निकलने ही वाला था, जिसे सिकन्दर पहली बार देखने जा रहा था।
"क्या नाम क्या है तुम्हारा?" सिकन्दर ने उसे ज़ोर से पकड़ते हुए पूछा, "तुमसे मतलब" वो बोला। इस बीच Driver भी गुस्सा होकर चिल्ला पड़ा, "क्या कर रहे हो साब, सही से बैठो" पर दोनो ने Driver की बात को नज़रअंदाज़ कर दिया और सिकन्दर ने उस आदमी को डाँटते हुए कहा, "अरे यार पागल हो क्या, मरने क्यों चल दिए हो, देखो अपने सामने तो मैं तुम्हे मरने दूगाँ नही, इसलिए चुपचाप मेरे साथ समुद्र किनारे तक चलो, Sunrise देखो उसके बाद तुम जो चाहना करना, तुम्हारी मौत से मैं अपनी सुबह नही बर्बाद करना चाहता।" उस लड़के के कुछ समझ आया और वो शान्त होकर बैठ गया, दो मिनट में समुद्र भी आ गया। दोनो जाकर Sunrise देखने लगे। सिकन्दर को उगता हुआ सूरज दिख रहा था और उसको अभी-अभी तारो के जाने से सूना हुआ आसमान, सिकन्दर चिड़ियों की चहचहाहट सुन रहा था और वो झिंगुर की किर्र-किर्र।
जब सूरज कुछ ऊपर आ गया तो वो लड़का बोला, "इतने खुश किस बात पर हो रहे हो, पहले कभी सूरज नही देखा क्या?"
"नही ऐसा नही है बस यूँ समुंद्र किनारे कभी सूरज निकलते हुए नही देखा, तुम तो यहीं से होगे इसलिए तुम्हारे लिए यह चीज़ कोई मायने नही रखती होगी, सब मुम्बई वालो का यही होगा मुझे पता है पर मैं दिल्ली से हूँ।"
"मैं भी यहाँ से नही हूँ पर मुझे इन सब में कोई Interest नही है।"
"अच्छा तो कहाँ से हो और वैसे तुम्हारा नाम क्या है बताओ तो सही।"
"अमर, UP से हूँ।" वो बोला और सूरज को देखने लगा कि ऐसा क्या खास है इसमें जो यह सुबह की नींद छोड़कर इसे देखने आया है। दोनो दस-पंद्रह मिनट शान्त बैठे रहे फिर अमर बोला, "हो गई तुम्हारी सुबह खूबसूरत, अब मैं जा रहा हूँ।" सिकन्दर ने उसे रोकते हुए पूछा, "अरे लेकिन यह तो बताओ कि मरना क्यों चाहते हो, क्या हुआ है, एक मैं हूँ जो यह सोचता रहता हूँ कि इतनी बड़ी दुनिया है पूरी Explore करे बिना मर गया तो मेरी आत्मा को सुकून कैसे मिलेगा, मुझे दुनिया का हर गली कूचा देखना है और तुम मरने चले हो, उम्र क्या है तुम्हारी?" अमर की आँखे गीली तो पहले से थी पर इतना सुनकर एक पानी की बूँद अचानक निकल पड़ी और वो बोला, "तुम्हे क्या मतलब, कौन हो तुम? तुम्हे जीना है जीते रहो, हज़ार साल जियो, मुझे नही जीना मुझे मरने दो।"
"लेकिन Suicide करना गलत है ना, इसलिए कह रहा हूँ" सिकन्दर ने उसे समझाया। इस बार अमर रुआँसी आवाज़ में बोला, "गलत? क्यों भई गलत क्यों है, हम इस दुनिया में आए हैं इसमे हमारी रज़ामंदी थी क्या, नही ना, इसका मतलब यहाँ इस ज़िंदगी को जीना एक मजबूरी है, हमे इस दुनिया में हमारी मर्ज़ी के खिलाफ पटक दिया गया है तो अब यहाँ रहना या ना रहना तो हमारा फैसला होना चाहिए, तुम जैसे लोगो को यहाँ रहना है अच्छी बात है मुझे नही रहना, Simple।" यह सब सुनकर सिकन्दर चुप सा रह गया जैसे किसी ने बड़ी Logical बात कह दी हो पर उसे फौरन ही लगा कि कोई Suicide को कैसी भी Logical बात कह कर justify नही कर सकता तो उसने कहा, "अच्छा ऐसा है बेटा, तो चलो फिर मैं Police को बता देता हूँ, कुछ वक्त के लिए अंदर जाओगे तो पता चलेगा, Suicide करने की कोशिश की सज़ा मालूम है ना?" "कौन सी दुनिया में जी रहे हो, Suicide की अब कोई सज़ा नही है, नियम बदल चुका है, शायद सरकार को भी समझ आ चुका है कि लोगो को जीने के लिए मजबूर नही करना चाहिए।" अमर ने गर्व से कहा।
इतनी बात हुई तो सिकन्दर असहाय सा महसूस करने लगा इसलिए वो बोला, "मैं एक बहुत बड़ी जिंदगी जीना चाहता हूँ, मेरी Bucket List में बहुत कुछ है, पर आज से उसमें सबसे ऊपर तुम्हारी जान बचाना है, तुम एक मौका दो मुझे मैं तुम्हे दिखा दूँगा कि यह दुनिया कितनी खूबसूरत है और यहाँ जीने के लिए क्या कुछ है, बोलो, एक मौका दोगे मुझे, नही मुझे नही, ज़िंदगी को?" अमर ने साफ इन्कार कर दिया और समुंद्र की तरफ भागने लगा, सिकन्दर ने उसे जैसे-तैसे पकड़ा और कहा, "अरे क्या कर रहे हो, रुको तो सही, देखो तुम इतना जिये हो दो तीन दिन और जी लो, Please, एक मौका बस एक" सिकन्दर ने उसे काफी समझाया, आखिरकार उसके कुछ समझ आया तो वो कुछ देर तक चुप रहा और फिर बोला, "अच्छा, ठीक है।" दोनो के बीच एक तरह का सौदा हो गया कि कुछ दिन तक एक साथ रहेंगे और अमर ने जो एक मौका दिया है ज़िंदगी को सिकन्दर उस मौके को सही साबित करेगा।
दिन की शुरूआत तो हो चुकी थी, सिकन्दर का पूरे दिन का Plan भी Set था पर अमर के पास कोई Plan नही था क्योंकि उसके हिसाब से तो वो अब तक मर चुका होता। सिकन्दर को ऐलोरा की गुफाएँ देखना थी पर अमर ने कहा, "Elora caves तो सब जाते हैं तुम्हे कुछ अलग देखना चाहिए, धोबी घाट चलो" "धोबी घाट, Are you Serious, वहाँ क्या है?" सिकन्दर ने चौंकते हुए पूछा। अमर ने उसे समझाया कि उसने ही कहा था कि वो हर गली कूचा घूमना चाहता है तो धोबी घाट में क्या बुराई है और मुम्बई का धोबी घाट तो काफी मशहूर है। सिकन्दर को थोड़ा अटपटा लगा पर उसने अमर की बात मान ली, दोनो ने Taxi की, और चल दिए। दोनो के सफर की शुरूआत हो चुकी थी, इस सफर की मंज़िल क्या होगी उन दोनो को नही पता था, हालांकि दोनो ने अपनी-अपनी मंज़िल सोच रखी थी। सिकन्दर हर चीज़ को आते हुए देख रहा था, गाडियाँ, पेड़-पौधे, इमारते और बहुत कुछ पर अमर को सब पीछे छूटता हुआ दिख रहा था, गाडियाँ, पेड़-पौधे, इमारते और सब कुछ।
"अच्छा अब यह तो बताओ, मरने क्यों जा रहे थे" सिकन्दर ने पूछा, "यह मत पूछो Please, क्योंकि फिर तुम उस पर ज्ञान देना शुरू कर दोगे। मैं मरने क्यों जा रहा था यह बात ज़रूरी नही है, ज़रूरी यह है कि तुम मुझे ऐसा क्या दिखाओगे जो मैं इस दुनिया से जाने का ख्याल छोड़ दूँ" अमर ने कहा। सिकन्दर ने रज़ामन्दी में सर हिला दिया और दोनो चुप हो गए।
कुछ देर सफर शान्ति से बीता और फिर सिकन्दर ने पूछा, "तुमने अश्वत्थामा का नाम सुना है?"
"हाँ वो महाभारत वाले ना, हाँ सुना है"
"कहा जाता है वो आज भी ज़िन्दा हैं, अमर हैं, तुम्हे क्या लगता है यह सच है, ऐसा हो सकता है?"
"हो भी सकता है क्या पता।"
सिकन्दर कुछ सोचने लगा जैसे किसी सपने में खो गया हो, अमर ने उसे हिलाया और यह सब पूछने की वजह जाननी चाही, पर सिकन्दर ने बात टाल दी और बाहर देखने लगा।
धोबी घाट आ चुका था, सुबह का वक्त था इसलिए चारो तरफ कपड़े धुल रहे थे, सिकन्दर का यह सब देखकर मुहँ बिगड़ गया तो अमर बोला, "वहाँ तुम्हे सिर्फ अमीर लोग दिखते पिकनिक मनाते हुए, वो मौज-मस्ती तो इस ज़िंदगी के बीच से निकाला गया एक पल है पर यहाँ ज़िदगी खुद है, देखो ज़रा नज़र दौड़ा कर चारो तरफ, लोग यहाँ 14-15 घंटे काम करते हैं तब भी उस पिकनिक के लिए पैसे नही जुटा पाते जो तुम Elora caves में देखने और मनाने जाने वाले थे।" सिकन्दर यह सुनकर चुप रहा, वो बस देख रहा था कि लोग कितनी मेहनत कर रहे हैं, उसे अमर की बात सही लगी। वो एक धोबी के पास गया और उसने उनका हाल-चाल और ज़िंदगी के बारे में पूछा तो वो बोला, "सब मस्त है भाऊ, और मेहनत का क्या मेहनत तो जिन्दगी है, वैसे भी जो Machine चलती नही उसमे ज़ंक लग जाती है, तो अपने को चलते रहने का है और मस्त रहने का है।" उस इंसान की यह ज़िंदादिली देखकर सिकन्दर को बहुत अच्छा लगा, वो अमर के पास गया और बोला, "सुना तुमने वो क्या बोला, मस्त है जिन्दगी, समझे कुछ, कड़ी मेहनत से पैसा कमाने का यह मतलब नही है कि ज़िन्दगी बेकार और बदसूरत है, और एक बात, मैं तुम्हे दुनिया दिखाने निकला था उल्टा तुम मुझे दिखाने की कोशिश करने लगे, अब यहाँं से हम मेरी मर्ज़ी से जाएँगे।"
दोनो थोड़ी देर वहाँ टहले और फिर वहाँ से निकले तो 10 बज गया था, दोनो नाश्ते के लिए एक Restraunt में गए। दोनो ने एक दूसरे के नाश्ते को देखकर मुहँ बिगाड़ा और बोले, "तुम यह खाने वाले हो?" सिकन्दर का नाश्ता Healthy था और अमर का Heavy। अमर ने सिकन्दर से पूछा कि क्या उसे सचमुच यह पसन्द है तो सिकन्दर बोला, "अरे नही यार, पर क्या करे, Healthy Life जीने के लिए Healthy खाना ज़रूरी है, मै नही चाहता मुझे कोई बीमारी हो और मैं मर जाऊँ, खैर छोड़ो, तुम नही समझोगे" अमर यह सुनकर थोड़़ा सा मुस्कुराया और दोनो नाश्ता करने में लग गए। नाश्ते के साथ कुछ बाते भी होती रही, बातो-बातो में अमर ने बताया कि वो घर वालो से 2 हफ्तो की trip का कह कर आया है और उसका हमेशा मन होता है कि मर जाए पर उसने मरने की वजह नही बताई। फिर बात आयी कि अब जाना कहाँ है और करना क्या है। दोनो सोचते रहे और आखिरकार तय हुआ कि बस रोड पर चलना शुरू करेंगे, जो भी सही जगह नज़र आयेगी वहाँ चलेंगे।
दोनो चलने लगे और बाते होने लगी, सिकन्दर ने कहा, "तुम्हे पता है, 3rd Centuary BC में एक Chinese राजा था उसको कहीं से पता चला कि Mercury पी लेने से अमर हो सकते हैं तो उसने अमर होने के लिए Mercury पी ली थी।" सिकन्दर ने पहले भी इस तरह की बाते की थी इसलिए यह सुनकर अमर ने शक से पूछा कि आखिर क्यों वो यह अमर होने के बारे में इतना बात करता रहता है। सिकन्दर थोड़ा सा झिझका और फिर बोला, "मैं अपने बारे में कुछ क्यों बताऊँ तुम तो कुछ बता नही रहे हो।"
"हाँ क्योंकि तुम judge करोगे और ऊपर से ज्ञान देना शुरू कर दोगे।"
"अरे तुमसे यह किसने कह दिया कि मैं Judge करूँगा, और रही ज्ञान की बात चलो वो भी नही दूँगा, सिर्फ चुपचाप सुनुँगा।"
"पक्का?"
"हाँ पक्का, बोलो अब"
"देखो, may be यह बड़ा odd sound करेगा तुम्हे,पर मुझे उन चीज़ो में बिल्कुल Interest नही है जो खत्म हो जानी हैं। इस दुनिया में कुछ वक्त में सब कुछ खत्म हो जाता है, जैसे पढाई, नौकरी, रिश्ते, ज़िंदगी और यह दुनिया भी, यहाँ तक कि वो प्यार भी खत्म हो जाता है जिसकी लोग दुहाईयाँ देते हैं। अब जिस चीज़ को खत्म ही हो जाना है तो इंसान उस पर वक्त क्यों ज़ाया करे तुम ही बताओ? पूरी ज़िंदगी लगाकर इंसान अपनी ज़िंदगी बनाए और एक दिन अचानक वो ज़िंदगी खत्म हो जाए, I mean यह क्या Logic हुआ, इसलिए मैं यह ज़िंदगी खत्म करके वहाँ जाना चाहता हूँ जहाँ कुछ खत्म नही होगा।"
"मगर तुम्हे क्या पता मौत के बाद क्या होगा?"
"मुझे नही पता, मगर इतना मालूम है कि ज़िंदगी की तरह मौत खत्म नही होगी वो एक बार आएगी तो फिर छोड़कर जाएगी नही।"
"तुम दूसरे जन्म में विश्वास नही रखते?"
"मेरे विश्वास रखने ना रखने से कोई खास फर्क नही पड़ता और अगर दूसरा जन्म होगा भी तो कितनी बार, 7 बार ना मैं 7 बार भी यह करने के लिए तैयार हूँ।"
"यह तो सच में बड़ा अजीब है मुझे तो लगा था किसी लड़की-वड़की का चक्कर होगा इसलिए मरने चले हो पर यहाँ तो मामला Philosophical है।"
"खैर अब तुम बताओ"
"तुम्हे यह बेवाकूफी भरी और Filmy बात लगेगी मुझे मालूम है, पर मुझे यह अमर होने वाले Concept में बड़ा Interest है, मुझे मौका मिले ना तो मैं तो होना चाहूँगा।"
"अच्छा! लगता है तुमने वो सिकन्दर वाली कहानी नही सुनी वरना ऐसे अमर होने की बात ना करते, जिसमे उसे एक बेहाल कौआ मिलता है जो अमर होता है।"
"हाँ अरे वो पता है मुझे पर मैं ऐसा थोड़े ही अमर होना चाहता हूँ, मैं तो कुछ ऐसा चाहूँगा जिससे मेरी उम्र एक जगह रुक जाए, मेरी Body अभी जैसी है वैसी रहे, हमेशा एकदम fit, समझे"
"और यह होगा कैसे?"
"यही तो पता नही है, पर कोशिश है पता लगाने की। But यार just imagine अमर होकर इंसान पूरी दुनिया की एक-एक जगह देख सकता है, आगे आनी वाली सारी technology को experience कर सकता है जैसे उड़ने वाली cars, transparent mobiles और क्या पता किसी और planet पर रहने लगे हम लोग, इसके अलावा पुराने-पुराने time capsules को खुलते देख सकता है, History को सही तरह से लिख सकता है और दूसरो तक पहुँचा सकता है इसके अलावा और भी बहुत कुछ कर सकता है।"
"अच्छा! तो यह बात है लेकिन यह possible नही लगता, मेरा वाला तो easily possible है।"
"देखा जाए तो हम दोनो ही ज़िंदगी के खत्म होने से घबराते हैं।"
"हम्म, शायद। वैसे अगर मेरे बस में होता तो मैं अपनी पूरी उम्र तुमको दे देता, हम दोनो का भला हो जाता।"
"हाँ, पता मैने कहीं पढ़ा था यह एक तरीका है अमर होने का कि एक इंसान दूसरे के Pure cells को अपने damaged cells से बदल दे और वो हमेशा यही करता रहे तो वो जवान बना रहेगा पर यह successfully करने लायक technology अभी नही है और वैसे भी यह किसी की जान लेकर मुझे Immortality नही चाहिए मैं कोई Marvel का Super villain थोड़े हूँ।"
"हाँ यह बात तो सही है तो अब क्या option बचता है?"
"एक तरीका इंसान के दिमाग़ को Computer programme में बदल देना भी है, मतलब इंसान का Digitization पर यह तो सबसे बुरा है जब इंसान अपने Physical form में ही नही बचेगा तो फायदा क्या। इसके अलावा तो बस Mythological Stories में बताई गई चीज़े ही बचती हैं जैसे सनातन धर्म में अमृत, इस्लाम में आब-ए-हयात और Greek Myths में Ambrosia और Fountain of youth, पर इन चीज़ो का क्या पता exist भी करती हैं या नही।"
"यह चीज़े तो सिर्फ किस्से कहानियों में होती हैं, पर अब एक काम करो मुझे मरने दो वरना मैं तुम्हे मार डालूँगा"
इतना कहकर अचानक अमर ने सिकन्दर का गला पकड़ लिया और पूरी ताकत से दबाने लगा। सिकन्दर छटपटाने लगा वो छुड़ा नही पा रहा था तभी सड़क पर चलते लोगो ने देख तो वो उन दोनो की तरफ बढ़ने लगे। अमर ने जब यह देखा तो उसने सिकन्दर का गला छोड़ कर उसकी गर्दन में हाथ डाल दिया और हँसने लगा यह दिखाने के लिए कि हम दोस्त हैं और मज़ाक कर रहे थे। सिकन्दर को भयंकर गुस्सा आ गया और वो अमर को धक्का देते हुए चिल्लाया, "दिमाग़ ठीक है तुम्हारा, क्या कर रहे हो, फिर तुम्हे दौरा पड़ गया। जाओ मरो जाके, मैं तो बस तुम्हारी जान बचाना चाहता था पर तुम पागल हो पागल।"
अमर वहीं रुक गया और सिकन्दर आगे चलता चला गया। 5 मिनट चलने पर सिकन्दर का गुस्सा शान्त हुआ और उसे महसूस हुआ कि अमर उसे ऐसे दिन दहाड़े सड़क पर मार थोड़ी सकता था इसका मतलब उसने यह सिर्फ सिकन्दर को डराने के लिए किया ताकि वो उसका पीेछा छोड़ दे। सिकन्दर एक दम सेे वापस मुड़ा और भागा, उसे डर था कि कहीं अमर ने suicide ना कर ली हो, पर अमर को उसने जहाँ छोड़ा था वो वहीं फुटपाथ पर बैठा था। सिकन्दर उसके पास गया और बोला, "मुझे पता है तुम मुझे डरा कर भगााना चाहते थे पर मैं तुम्हे मरने के लिए नही छोड़ने वाला, बहुत हो गया चलो मेरे साथ।"
"अरे यार! किस मनहूस घड़ी में मैं तुम्हारी गाड़ी के आगे आ गया। मैं ट्रेन से कूद सकता था या ज़हर खा सकता था पर मेरी मति मारी गई थी जो तुम्हारी गाड़ी के सामने आया। अब कहाँ जाना है तुम्हे?"
"मुझे नही हमे जाना है, मुम्बादेवी मंदिर।"
"मुम्बादेवी मंदिर! वहाँ क्या है और क्यों जाना है वहाँ।"
"मेरी तो कोई बात समझ आएगी नही तुम्हे इसलिए तुमको किसी ऐसे शख्स से सुनने की ज़रूरत है जिसे ज़िंदगी का, अध्यात्म का, मौत का और मौत के बाद का ज्ञान हो। मुम्बादेवी मंदिर के पुरोहित के बारे में मैने काफी कुछ सुना है वो तुम्हे सही रास्ता दिखा पाएँगे और दूसरी बात कि लोगो का मानना है वहाँ सारी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं तो तुम अपने लिए मौत माँग लेना और मैं अपने लिए ज़िंदगी माँग लूँगा, ठीक।"
अमर कहीं नही जाना चाहता था पर उसे यह भी पता था कि सिकन्दर उसका पीछा नही छोड़ेगा और अगर उसने लोगो के सामने बोल दिया कि अमर suicidal है तो मामला खराब हो जाएगा, क्योंकि यह बात सिकन्दर को नही पर अमर को मालूम थी कि अब Suicidal लोगो को Jail तो नही मगर mental hospital जाना पड़ता है इसलिए वो सिकन्दर के साथ चला गया।
दोनो मुम्बादेवी मंदिर पहुँचे और भक्त जब ना के बराबर बचे तो पुरोहित से मिले। सिकन्दर ने उन्हे अमर के बारे में पूरी बात बताई। अमर को सिकन्दर पर बहुत गुस्सा आ रहा था क्योंकि उसकी वजह से उसे पुरोहित के सवालो के जवाब देने पड़ रहे थे। पुरोहित ने अमर से पूछा कि क्या सचमुच वो ऐसी सोच रखता है तो अमर ने हामी भर दी लेकिन साथ में सिकन्दर के बारे में भी बताया कि कैसे वो अमर होने के बारे में बात करता है। पुरोहित को समझ आ गया कि इन दोनो के ही दिमाग़ में एक सनक सवार है पर उसने उन्हे समझाने के बजाए ऐसी बात शुरू कर दी जिसकी उन्हे बिल्कुल भी उम्मीद नही थी। पुरोहित ने कहा, "सिकन्दर बेटा, मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ।"
"जी मदद मुझे नही अमर को चाहिए है।"
"तुम्हे अमर नही होना?"
"हाँ होना है पर...।"
"...तो मेरी बात ग़ौर से सुनो। तुम्हे सागर-मंथन के बारे में पता है?"
"जी दादा जी ने बताया था बचपन में, थोड़ा-थोड़ा याद है।"
"हाँ तो उस ही सागर-मंथन में अमृत निकला था जिसका सेवन देवताओ ने किया था। देवताओ ने जब अमृत सेवन कर लिया तो अंत में उसकी कुछ बूँद बच गईं जैसे के कोई भी द्रव पीने पर उसके कुछ बूँद बच जाती हैं। दानवो को तो अमृत दिया ही नही गया और देवताओ में अमृत पीने वाला कोई नही बचा था इसलिए देवताओ ने अमृत की उन बूँदो को एक छोटी सी शीशी में बन्द करके रख दिया था। इसका पता उस समय सिर्फ देवताओ को था परंतु बाद में मनुष्य तक इसका समाचार पहुँचा। शीशी कहाँ रखी गई इसके बारे में चुनिंदा लोगो को ही पता था। जैसे-जैसे समय बीता उस शीशी की जगह बदलती रही, आज से लगभग 400 साल पहले जब मुम्बादेवी मंदिर बना तो उस अमृत वाली शीशी को उसमें रखा गया जोकि उस वक्त छत्रपति शिवाजी टर्मिनस के स्थान पर था पर जब अंग्रेज़ो का शासन आया तो उन्होने मंदिर को बाज़ार के बीच में बनवा दिया और उसी के साथ वो शीशी भी यहाँ आ गई। अमृत बस बच ही गया क्योंकि अगर अंग्रेज़ो को भनक भी लग जाती कि इस मंदिर में ऐसा कुछ है तो वो कुछ भी करके वो शीशी ले जाते। वो अमृत आज भी इस मंदिर में है।"
"माफ कीजिएगा पर मुझे इस बात पर यकीन नही है क्योंकि अगर ऐसा होता तो कोई ना कोई उसे पी ज़रूर लेता वो आज तक रखा नही होता। मैं कोई पहला इंसान थोड़े ही हूँ जिसे अमर होने का ख्याल आया है।"
"हाँ बेटा बात तो तुम्हारी सही है मगर हर खूबसूरत फूल के साथ काँटे भी होते हैं। वैसे ही जब सागर-मंथन हुआ था तो उसमे से पहले हलाहल विष निकला था। अमृत को उस समय भी पाना सरल नही था बेटा, देवताओ और दानवो को अमृत से पहले विष का सामना करना पड़ा था। अंततः उसे भोलेनाथ ने पिया। उस विष के बचे हुए कुछ बूँदो को भी अमृत की ही तरह एक अपारदर्शी शीशी में रख दिया गया। परेशानी यहीं से शुरू होती है कि उन दोनो को एक जैसी शीशी में और एक साथ ही रखा गया था। जब रखा गया तब उनको पहचानना आसान था पर उस वक्त उसको ग्रहण करने वाला कोई नही था। जब तक मनुष्य में अमृत का लोभ आया तब तक उन दोनो के बीच का अंतर मिट गया, इस वजह से उसे कोई भी ग्रहण नही कर पाया।"
यह कह कर पुरोहित मंदिर के अंदरूनी हिस्से में चले गए और करीब 5 मिनट बाद दो पुरानी सी दिखने वाली शीशी लेकर आए और बोले, "यह हैं अमृत और विष। देखो अमर इसमें तुम्हारे मतलब की भी चीज़ है मतलब विष, और सिकन्दर तुम्हारे लिए अमृत मगर यह तुम लोगो के खुद समझना पड़ेगा कि किसमे क्या है।"
अमर और सिकन्दर एक दूसरे को देखने लगे, उन दोनो को ही लगा था कि पुरोहित दोनो को समझाएँगे कि आत्महत्या करना या अमरता पाने का लोभ दोनो ही गलत है पर यह तो उसका रास्ता बता रहे हैं। इतना बड़ा राज़ सुनकर दोनो को यकीन नही हो रहा था, उन्हे समझ ही नही आ रहा था कि कहें तो कहें क्या। आखिरकार अमर बोला, "अगर यह सच भी है तो यह आप हमे क्यों दे रहे हैं आप तो हमे जानते तक नही हैं?"
"बेटा, जब मंथन में से अमृत निकला था तब दानवो ने उसे पाने की कोशिश करी थी पर भगवान विष्णु ने ऐसा होने नही दिया तो तुम्हे क्या लगता है कलयुग में भगवान अमृत को किसी के भी हाथ में जाने देंगे। तुम्हारी व्यथा सुनकर मेरे मन में पहला विचार यही आया कि यह मैं तुम लोगो को देदूँ। निःसंदेह यह भगवान की ही इच्छा है, शंका ना करो।"
अब दोनो को यकीन होना शुरू हो गया था। सिकन्दर ने वो दोनो शीशी पुरोहित से लेली और कहा, "हम सोचकर फैसला करेंगे।"
"हाँ, अभी तुम दोनो जाओ, कल तक सोच विचार करके इसको ग्रहण कर लेना और आकर बताना ज़रूर कि किसके हिस्से में क्या आया।"
दोनो खाना खाकर Hotel में सिकन्दर के कमरे पर आ गए। वो बड़ी कश्मकश मेें थे कि क्या किया जाए, सिकन्दर बोला, "यार मेरा तो सोच-सोच कर दिमाग़ खराब हो रहा है कि यह क्या हो गया है, मैने इसकी उम्मीद तो बिल्कुल नही की थी। पहली बात तो यह पता कैसे चलेगा कि ज़हर कौन सा है और अमृत कौन सा। और अगर पता भी चल गया तो मैं अमृत तो पी लूँगा पर क्या तुम ज़हर पी लोगे, अगर हाँ तो फिर यार मेरा तुम्हे अब तक बचाने का क्या मतलब बनेगा अगर मैं अब तुम्हे खुद ही मर जाने दूँ। मेरे कुछ समझ नही आ रहा।"
"अरे यार कम से कम अब तो तुम ऐसी बात ना करो, जब पंडित जी ने कुछ नही कहा तो तुम क्यों कह रहे हो?"
"लेकिन अगर मैने तुम्हे मर जाने दिया तो मुझे बहुत Guilty feel होगा। मुझे बहुत अजीब लग रहा है।"
"वो सब छोड़ो पहले यह सोचो कि पता कैसे चलेगा कि इसमे से अमृत कौन सा है।"
रात भर ऐसी ही बाते चलती रहीं, मुश्किल का कोई हल नही निकला। बहुत हिम्मत करके भी दोनो से यह Risk नही लिया गया। सुबह होते ही दोनो वापस मुम्बादेवी मंदिर पहुँचकर पुरोहित से मिले और उन्हे अपनी रात भर की बाते बताईं। सिकन्दर बोला, "हमे माफ कर दीजिए हम कोई फैसला नही कर सके, हमे कुछ समझ नही आया और इतना बड़ा जोखिम लेने की हम मे हिम्मत नही है, यह दोनो शीशियाँ आप वापस रख लीजिए।"
पुरोहित ने वो शीशियाँ लेली और बोले, "इतने बड़े-बड़े फैसले तुम लोगो ने कर रखे हैं और उसके लिए एक बड़ा जोखिम नही ले पाए। खैर छोड़ो, अब मेरी बात सुनो, तुम लोगो ने इस दुनिया में हमेशा रहने या कदापि ना रहने का फैसला तो कर लिया है पर तुमने इस जीवन को तो जाना ही नही है। चलो मैं तुम्हे तुम्हारे तरीके से समझाने की कोशिश करता हूँ। तुम लोग School College में परीक्षा देते होगे तो क्या Paper को बिना पढ़े उसे हल करने या छोड़ने का फैसला कर लेते हो? नही ना, तो जीवन के साथ यह क्यों कर रहे हो। पहले कम से कम अपने इस जीवन को जानो तो सही फिर सोचना कि क्या करना है। बेटा अमर, तुम्हे क्या लगता है भगवान ने हम लोगो को बिना किसी कारण के इस दुनिया में भेजा होगा और सिकन्दर तुम्हे क्यों लगता है कि तुम्हे अमरता का वरदान देकर भगवान अन्य मनुष्यो से अन्याय करे?"
दोनो चुप और हैरान थे, पुरोहित ने आगे बोलना शुरू किया, "तुम दोनो को ज़रा भी ज्ञान नही है, जाओ पहले कुछ पढ़ो जाकर। गीता, वेद, उपनिषद, महाभारत जैसे महान ग्रंथ पढो, इतिहास पढ़ो अपने धर्म का और हो सके तो अन्य धर्मो का भी पढ़ो।"
"आप ऐसा कैसे कह सकते हैं कि हमे बिल्कुल ज्ञान नही है, हमने यह सब पढा ना सही पर अपने घर वालो से बहुत कुछ सुना ज़रूर है, हमे भी चीज़ो की जानकारी है।"
पुरोहित मुस्कुराए और अच्छा कहते हुए उन्होने एक शीशी खोली और पी ली। अमर और सिकन्दर हैरानी से देखते रह गए, वो दोनो जब तक कुछ बोल पाते तब तक उन्होने दूसरी शीशी भी खोली और पी गए। दोनो के कुछ समझ नही आया कि पुरोहित ने यह क्या किया। दोनो शीशी पीकर पुरोहित बोले, "बच्चो अगर तुम्हे ज़रा भी ज्ञान होता ना तो तुम समझ जाते कि मैने जो यह शीशी वाली कहानी तुम्हे बताई यह असत्य है, ऐसा कुछ भी नही हुआ था। इन शीशियो में गंगाजल था। हलाहल विष की तो अगर एक भी बूँद संसार में बच जाती तो यह संसार बचता ही नही तभी तो भोलेनाथ ने उसे पीया था और अमृत की भी अगर एक भी बूँद बची होती तो दानव उसे पाने के लिए युद्ध पर युद्ध करते ही रहते।"
"आपने हमसे इतना बड़ा झूठ बोला?" अमर ने शिकायत की।
"हाँ क्योंकि तुम्हारी पीढ़ी बड़ो की बातो पर विश्वास नही करती, बल्कि साक्ष्य पर करती है। वही साक्ष्य देने के लिए मैने यह झूठ बोला ताकि तुम लोग समझ पाओ कि तुम्हारे पास ना सही ज्ञान है ना बड़े फैसले कर पाने की बुद्धि और ना जोखिम लेने का साहस। अगर कुछ है तो वो है एक अजीब बात का हट और उस हट को पूरा करने की सनक। मेरी बात का बुरा ना मानो, ठंडे दिमाग़ से विचार करो, सोचो कि क्या बिना पूर्ण ज्ञान लिए कोई फैसला करना उचित है या अनुचित। पहले जीवन को जान तो लो फिर यह सब सोचना।"
"नही हम बुरा नही माने हैं बस हैरान हैं" सिकन्दर ने कहा।
पुरोहित ने आगे बोलना शुरू किया, "बच्चो, यह दुनिया एक रणभूमि है और यह जीवन एक युद्ध है। अमर बेटा, तुम दुनिया से चले जाना चाहते हो ना, कहाँ जाओगे वो बाद की बात है पर तुम खुद सोचो की रणभूमि से भाग जाने वाला व्यक्ति जहाँ भी पहुँचेगा क्या उसका वहाँ सत्कार होगा? और सिकन्दर जिस ग्लानि की बात तुमने मुझे बताई अमर होने से हज़ार बार ऐसी ग्लानि का अनुभव करना पड़ेगा, कर पाओगे? देखो, भगवान ने ही सबको जीवन दिया है और जीवन लेने का अधिकार भी उसी का है, मनुष्य इसमे ना ही पड़े तो अच्छा है। महाभारत में निर्दोष अभिमन्यू को मरना पड़ा और अधर्मी अश्वथामा को अमरता मिली तो अब तुम इसे अन्याय कहोगे क्या? भगवान के चयन पर प्रशन उठाओगे क्या?"
दोनो को वो सब सुनने को मिल रहा था जो उन्होने कभी नही सुना था, उन्हे अपने दिमाग़ पर शक होना शुरू हो गया था। दोनो को समझ आ गया था कि उन्होने दुनिया देखी ही नही है, जिंदगी को समझा ही नही है और उनका ज्ञान तो ना होने जैसा है।
पुरोहित लगातार बोल रहे थे, "मनुष्य की सबसे बड़ी गलती है कि वो शरीर को ही सब कुछ समझता है उसी के जीने को जीना और उसी के मरने को मरना कहता है पर वो यह भूल जाता कि इस शरीर के अंदर एक आत्मा है जो वास्तविकता में वो है जिसे हम 'मैं' कहते हैं। शरीर तो केवल हमे इस लोक में रखने का माध्यम मात्र है।"
उन दोनो को बहुत ज़्यादा गंभीर होते देखकर पुरोहित ने बातो का एक दम से रुख मोड़ कर कहा, "अच्छा अब ज़्यादा दिमाग़ पर जोर ना डालो, जाओ और जाकर जीवन को जीओ, ज्ञान अर्जित करो, आनंद लो जीवन का। अनुगच्छतु प्रवाहं।"
वो दोनो वहाँ से वापस सिकन्दर के कमरे पर आ गए पर इतनी देर में वो एक दूसरे से कुछ नही बोले थे बल्कि किसी गहरी सोच में डूबे हुए थे। उनकी जिंदगी बदल चुकी थी, अमर ने उस ही दिन अपने शहर वापस जाने का इरादा कर लिया और सिकन्दर की flight ticket अगले हफ्ते की पहले से book थी। अमर सिकन्दर के कमरे से अपने कमरे पर गया और फिर वहाँ से निकल कर शाम की ट्रेन पकड़ कर डेढ़ दिन के सफर के बाद अपने शहर पहुँच गया। घर वाले भी थोड़ा हैरान थे इतनी ज़िद करके Semester के बीच में 10-15 दिन के लिए मुंबई गया और दो दिन ही रुक कर क्यों चला आया। उसने घर वालो की बातो को यह कह कर टाल दिया कि उसका मन नही लगा। अगले दिन वो college पहुँचा, college में अपने दोस्त वीर से मिला। वीर उसे Main gate पर ही मिल गया था, वो दोनो वहीं खड़े होकर बात करने लगे।
वीर बोला, "अरे तुम तो दो हफ्ते के लिए गए थे ना तो इतनी जल्दी वापस कैसे?"
"अरे वो लम्बी कहानी है सुकून से बताऊँगा, तुम बताओ सीमा से फिर कोई बात हुई।"
"उससे क्यों बात होगी वो तो अब ध्रुव के साथ है पर यार तुम्हारे पीछे मेरे तीन दिन बड़े अजीब गए हैं। मोहित सर ने हम लोगो का blog पढ़ लिया और उन्हे पता नही क्या सूझा कि मुझसे और सीमा से बात करी और समझाने की कोशिश करी कि सब ठीक कर लो, पर सीमा को क्या फर्क पड़ने वाला था। जब कुछ नही हो पाया तो कल शाम को उन्होने मुझे message किया"
वीर ने mesaage दिखाया और आगे बताया, "पर मेरे कुछ समझ नही आया कि क्या कहूँ इसलिए reply नही किया।"
"अरे अच्छा किया reply नही किया पागल आदमी है वो, इसको छोड़ो चलो अंदर चलो मैं बताता हूँ मुंबई में क्या-क्या हुआ।"
दोनो चले ही थे कि अचानक बहुत तेज़ bike की आवाज़ आयी उन लोगो ने मुड़कर देखा तो वो रवि था उसे देख कर अमर बोला, "कितनी तेज़ bike चलाता है यह, पक्का यह साला किसी दिन accident में ही मरेगा, देखना।"
"अरे छोड़ ना उसे, तू बता इतनी जल्दी क्यों भाग आया।"
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें