Disclaimer
यह एक series की चौथी कहानी है। Series होते हुए भी हर कहानी को अलग-अलग पढा जा सकता है तथा हर कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।
College शुरू हुए एक महीना हो गया था। एक दिन अचानक class में HOD एक लड़की को लेकर आए और बताया कि उसने अभी Admission लिया है, किसी Problem की वजह से वह जल्दी नही आ पाई थी। उनके साथ लड़की के पिता भी थे, जो कि देखने में ही बड़े Strict लग रहे थे। Teacher और Students को उसकी मदद करने की हिदायत देकर वो दोनो चले गए। सबकी नज़रे उस पर थी, और वो सिर्फ इसलिए नही कि वो New Admission थी बल्कि इसलिए भी क्योंकि वो इस Modern Private University में बुर्का पहन कर आयी थी। वो लड़की पूरे वक्त नज़रे नीचे करे खड़ी थी, HOD के जाते ही वो नज़रे नीचे करे-करे एक खाली Seat पर जाकर बैठ गई। जाते वक्त उसके कानो में किसी लड़के की आवाज़ पड़ी, "यह यहाँ क्या कर रही है यार, इसको तो किसी मदरसे में Admission लेना चाहिए था।" उसके बैठते ही Teacher ने उसे Introduction देने को कहा तो वो खड़े होकर बोली, "Sir, My name is Maria Khan, I am from Morabadab."
"Moradabad? तो यहाँ कैसे?"
"actually sir, मेरी family यहाँ Shift हो गई है।"
"oh, okay, sit down, and yes I have told everyone to maintain a blog, you should also do the same."
"but sir मेरे पास mobile या computer नही है।"
"oh! okay."
सारे Students उनकी बाते सुन रहे थे, बात आगे बढ़ पाती उससे पहले ही Recess हो गया। 5 लड़कियाँ जगह से उठी और मारिया के पास आयीं, सबने हाथ मिलाते हुए अपना-अपना नाम बताया, "नेहा, सना, सीमा, गुलशन, रीना।" वो लोग बात करने लगी ,उसका हाल-चाल पूछा और Lunch offer किया। उन लोगो के बहुत Insist करने पर उसने आलू के पराठे का एक निवाला ले लिया। उसे खाने के लिए उसने अपना नकाब उठाया। नकाब उठते ही class में जितने भी लड़के मौजूद थे सब उसकी तरफ देखने लगे, उसे बेइंतेहा अजीब लगा, उसने एक झटके से निवाला मुँह में रख कर नकाब गिरा दिया।
वो अपने पिता या भाई के साथ ही college आया और जाया करती थी। बात उसकी सब लड़कियों से होने लगी पर सना और रीना उसकी दोस्त बन गईं। लड़को की तरफ तो वो देखती तक नही थी, कोई लड़का कोशिश भी करता को वो सना या रीना से कहलवा देती कि मुझे कोई बात नही करनी। एक दिन सना ने पूछ ही लिया कि क्या बात है वो किसी लड़के से बात क्यों नही करती तो उसने मज़हब का हवाला दे कर उसका मुँह बन्द कर दिया। सना और रीना ने उससे Mobile के बारे में भी पूछा तो उसने कहा, "मेरी Family बहुत conservative है, उनको लगता है Mobile से लड़की बिगड़ जाएगी इसलिए नही दिया।"
"अरे वो तो हमारे घर वालो को भी लगता है पर इसका मतलब यह थोड़ी है कि Mobile ही ना दे, तुम college में हो अब।", रीना बोली।
"Doesn't matter, मुझे चाहिए भी नही।"
"पर हमे तुमसे बात करना हो तो? और college के Whatsapp group में सब हैं बस तुम ही नही हो।", इस बार सना बोली।
"college रोज़ आती हूँ ना यहीं बात करो।"
"और जब college खत्म हो जाएगा तब?"
"अल्लाह मालिक।"
मारिया हमेशा ऐसी बात करती थी कि सना और रीना कुछ बोल नही पाती थी। वो हमेशा Serious रहती थी, कभी मुस्कुरा दी तो बहुत बड़ी बात समझो। वो दोनो उसे एक अच्छा दोस्त मानती थी पर उसका रवैया उनके समझ नही आता था, किसी लड़के से बात ना करना, Mobile इस्तेमाल ना करना, कहीं बाहर घूमने ना जाना, class में भी नकाब लगाए बैठे रहना। वो बस खाना खाने के लिए नकाब उठाती थी वो भी ऐसे कि कोई लड़का ना देखे। उसकी घर और college के अलावा कोई ज़िंदगी ही नही थी।
कुछ वक्त बीत चुका था। एक दिन lecture के बीच में उनके Teacher मोहित ने वीर और अमर को खड़ा किया और उनको बताया कि उन दोनो की Attendance 75% से कम है इसलिए उन्हे आने वाले Unit tests देने को शायद नही मिल पाएँगे। यह सुनकर अमर बोला, "अरे Sir, sorry, गलती हो गई। Please इस बार देने दीजिए, अगली बार से सही रहेगी।"
"तुम्हे कुछ नही बोलना वीर?"
"जी Sir, गलती हो गई, माफ कर दीजिए, अगली बार से सही रखेंगे।" वीर ने अमर की ही बात दोहरा दी।
मोहित बच्चो से मज़ाक करता ही रहता था, इसलिए वो बोला, "अच्छा, चलो तुम्हारे class वालो से पूछ लेते हैं कि माफ करना चाहिए या सज़ा देनी चाहिए। बताओ तुम लोग क्या करे इनका, मार दिया जाए या छोड़ दिया जाए?"
बच्चे बोलने लगे "माफ कर दीजिए sir एक मौका तो मिलना ही चाहिए।" लगभग सारे ही Students यही बात अपने-अपने तरीके से बोल रहे थे, एक-दो लोग मज़ाक में 'मार दिया जाए' भी कह रहे थे मगर मारिया बिल्कुल चुप बैठी थी। मोहित ने मारिया से पूछा तो सबको लगा कि यह तो खड़े होकर गर्दन झुका कर बस इतना बोलेगी कि माफ कर दीजिए और बैठ जाएगी। वो खड़ी हुई और अपनी झुकी हुई गर्दन और नज़रो के साथ बोली, "हर गलती की माफी नही होती, कुछ गलतियों की सिर्फ सज़ा होती है, और वैसे यह भी देखना पड़ता है कि गलती करने वाला है कौन, अगर लड़का है तो माफ कर देना चाहिए और अगर लड़की है तो सज़ा ज़रूर देनी चाहिए।" सबकी हँसी रुक गई, एकदम सब अजीब नज़रो से उसकी तरफ देखने लगे। रीना ने उसका हाथ खींच कर उसे बैठा लिया। मारिया लोगो की नज़रो में दिन प्रतिदिन और अजीब होती जा रही थी। लड़के तो उसके पास भटक भी नही सकते थे और लड़कियाँ भी अब उससे दूरी बनाने लगी थी। सिर्फ सना और रीना से ही उसकी बात ढंग से होती थी।
पहला Semester ऐसे ही निकल गया, उसके इतने अजीब होने का वो दोनो पता नही लगा पाईं। एक दिन रीना नही आयी थी तो सना ने मारिया से संजीदगी से पूछा, "तुम मुझे दोस्त मानती हो?"
"बेशक"
"तो कुछ बताती क्यों नही?"
"क्या नही बताती?"
"वो तो तुम जानो, पर कुछ तो है जो तुमने अपने दिल में दबा रखा है।"
"दिल की बातो का दिल में रहना ही बेहतर होता है।"
"नही, जो बात आपको अन्दर से खा रही हो उसे दोस्तो से कहना बेहतर होता है।"
"ऐसा कुछ नही है।"
"मैं तुम्हे अंधी और बेवकूफ लगती हूँ? अरे मारिया तुम्हारी शक्ल पर लिखा है कि कोई बात है।"
"तो पढ़ लो।"
"अरे यार! देखो दोस्त मानती हो तो सही से बताओ वरना मै भी नही पूछूँगी आज के बाद और नही बताओगी तो मैं समझ जाऊँगी कि तुम नही मानती मुझे कुछ दोस्त-वोस्त।"
"तुम senty क्यों हो रही हो?"
"because I hate it कि मैं अपनी हर बात Share करूँ और तुम ज़रा सा भी कुछ ना बताओ। मैने तुम्हे बताया कि मुझे वीर अच्छा लगता है उसे BF बनाने का सोचती हूँ, मैने तुम्हे यह भी बताया कि मेरे घर वाले मेरी Graduation पूरी होते ही शादी कर देना चाहते हैं पर मजाल है जो तुम कुछ भी बताओ अपने बारे में। ऐसे कोई दोस्ती नही होती, friendship is a two way thing."
"I need time"
"time किस लिए"
"सोचने के लिए कि तुम्हे बताऊँ या नही।"
"what? तुम seriously अजीब हो यार।"
सना को गुस्सा भी आ रहा था और irritation भी हो रही थी पर मारिया ने उसके बाद इस बारे में बात नही करी। College पूरा करके दोनो अपने-अपने घर चली गई पर दोनो ही सोच में डूबी हुई थी। मारिया समझ नही पा रही थी कि सना से क्या कहे, सच बताए भी तो कैसे बताए और सना बस इसी सोच में थी कि मारिया इतनी अलग क्यों है और क्या वो अपनी परेशानी उसे बताएगी या नही।
अगले दिन सना ने पूछा नही था पर मारिया बताने को राज़ी हो चुकी थी। उस दिन रीना भी आयी थी तो उसने भी जानने की उत्सुकता दिखाई। Class में बताना उसे सही नही लगा इसलिए तीनो मारिया के कहने पर Recess होते ही cafe गई। हालांकि मारिया को तो पता ही नही था कि cafe है कहाँ क्योंकि वो पहली बार जा रही थी। सना और रीना के साथ cafe पहुँच कर मारिया ने बताना शुरू किया, "मैने 12th मुरादाबाद से किया है, पहले हम वहीं रहते थे। वहाँ मेरी family का business था जिसे मेरे अब्बू और दो बड़े भाई मिलकर चलाते थे। मेरी family हमेशा से religious रही है पर उस वक्त मै सिर्फ एक scarf बाँधा करती थी, मेरे पास mobile भी था, दोस्तो से कभी-कभी मिल भी लेती थी, सब कुछ सही था और फिर एक दिन मुझे एक लड़के से प्यार हो गया। फैज़ान दिखने मे सबसे अच्छा ना सही पर पढ़ाई और आदत-मिजाज़ में बेहतर था। 11th से crush था मुझे उस पर लेकिन मैने कभी कहा नही, उसने ना जाने क्यों 12th शुरू होते ही मुझे Propose कर दिया, मैने accept कर लिया। मै बस उससे School में ही मिलती थी डर के मारे कभी बाहर नही मिली। School time में उसने एक बार मुझे Kiss किया था मुझे बहुत अच्छा लगा था पर घर पहुँच कर अम्मी-अब्बू का चेहरा देखा तो बहुत बुरा लगा कि मैने यह क्या कर लिया। यह ज़िना है और ज़िना गुनाह है। उसके बाद से मैने कभी उसे Kiss नही किया बल्कि उससे कहा कि यह सब हम शादी बाद करेंगे, वो भी कहता था कि शादी करेगा। School पूरा हो गया, Farewell हो गई, Board exams का आखिरी दिन आ गया तो वो कहने लगा कि चलो कहीं चलते हैं फिर क्या पता कब मिलना हो, मै भी यही सोच रही थी तो मै चलने को राज़ी हो गई। जगह का सोचते रहे पर समझ नही आया कि कहाँ जाए तो उसने एक Hotel चलने को कहा क्योंकि बाहर तो कोई भी हम लोगो को साथ में देख सकता है, मै मान गई। तुम लोगो को लग रहा होगा क्या पागल लड़की है लड़के के साथ Hotel चली गई। हाँ, पागल ही थी मै उसके प्यार में। मेरे लिए उस वक्त उसके साथ Hotel जाने का मतलब उसके साथ सिर्फ वक्त गुज़ारना था। कुछ देर हम बाते करते रहे और फिर वो मुझे Kiss करने लगा, मै भी करने लगी पर बात जब आगे बढ़ी तो अचानक मेरी आँखो के सामने अब्बू का चेहरा दौड़ गया। मैने उसे मना कर दिया, वो एक मिनट के लिए रुका और फिर से करने लगा। इस बार मेरे मना करने का उस पर कोई असर नही पड़ा, वो ज़बरदस्ती करने लगा, मैने उसे धक्का दिया, उसने मुझे फिर पकड़ लिया, इस बार उसकी पकड़ मज़बूत थी। मै उसे प्यार से समझाने लगी, इतने पर वो जब नही समझा तो डाँटने लगी पर उसे जैसे कुछ सुनाई नही दिया। वो Kiss से और आगे बढ़ता चला गया, बहुत आगे, मै बस छुड़ाने की कोशिश कर रही थी, करती रही, करती रही, पर आखिर में मैं थक गई, मैने हाथ पैर छोड़ दिए और उस पल मुझे समझ आया कि मेरा Rape हो रहा है। वो Rape कर रहा था और मैं सोच रही थी, 'क्या यह सचमुच Rape है? क्या मुझे बचाओ बचाओ चिल्लाना चाहिए? कौन आएगा यहाँ मुझे बचाने? मै इस Hotel में अपनी मर्ज़ी से आयी थी, और किससे बचाने को चिल्लाऊँ, इस लड़के से, जिससे मुझे बेपनाह प्यार है? क्या यह मेरे प्यार करने की सज़ा है? मेरे अब्बू मुझे इस हाल में देखेंगे तो क्या होगा? अल्लाह तो देख रहा होगा वो क्या सोच रहा होगा?'
खेल खत्म हो गया, मै Bed पर पड़ी रही, वो बोला चलो उठो जल्दी देर हो रही है। मै उठी, कपड़े सम्भाले और किसी Robot की तरह चल दी।"
"मारिया, I am so sorry, मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नही था तुम्हारे साथ इतना बुरा हुआ है।" सना बोली, रीना बिल्कुल चुप बैठी हैरानी से मारिया को देख रही थी। मारिया आगे बोली, "बुरा? हाँ घर जाते वक्त मुझे भी यही लगा था कि यह सबसे बुरा है पर जैसे तुम लोगो को नही पता वैसे ही मुझे भी नही पता था कि बुरा अभी होना बाकी था। मै रोते-रोते घर पहुँची, घर में दाखिल होते ही अब्बू ने मेरे थप्पड़ मारा और बोले कहाँ थी तू? मै कुछ बोलने की हालत में नही थी। अब्बू दोबारा मेरे कंधो को झंझोड़ते हुए बोले, कहाँ अपने बाप की इज़्ज़त को नीलाम कर के आ रही है। हमारे किसी मोहल्ले वाले ने मुझे Hotel में फैज़ान के साथ जाते हुए देख लिया था और अब्बू तक खबर पहुँचा कर उसी वक्त गया था। उस दिन अब्बू ने मुझे बहुत मारा, मारते मारते मेरी पीठ पर एक डंडा तोड़ दिया। वो डंडे की मुझे चोट मालूम भी नही पड़ी और पड़ती भी कैसे, जिस लड़की की इज़्ज़त उसके प्यार ने लूट ली हो, उसको यह डंडो की चोट क्या लगती। मै उस शाम से लेकर अगली सुबह तक एक जगह पड़ी रही, किसी ने मेरी कोई खबर नही ली। अगले दिन अब्बू बाहर से वापस आये और अचानक मुझे मारने लगे। अम्मी के बहुत पूछने पर उन्होने बताया कि मेरे Hotel जाने की बात मोहल्ले में फैल चुकी है और लोग उनसे तरह तरह के सवाल पूछ रहे हैं। मेरे अब्बू को बहुत लोग जानते थे, उनकी बहुत इज़्जत थी क्योंकि वो मस्जिद के मुतवल्ली भी थे।"
"मुतवली क्या?" रीना ने पूछा।
"मस्जिद के caretaker"
"ok ok"
"हाँ तो दिन ऐसे ही गुज़रने लगे कोई मुझसेे सीधे मुँह बात नही करता, अब्बू को जब कोई कुछ सवाल करता वो आकर मुझे मारने लगते। अम्मी से उम्मीद थी कि शायद वो मुझसे पूछ ले कि बेटा क्या हुआ था, क्यों गई थी, कौन था वो लड़का पर उल्टा उन्होने तो पापा से कहा कि इसकी शादी करा के इसे यहाँ से भेजो वरना लोग सवाल करते ही रहेगे। लेकिन लड़को के साथ Hotel जाने वाली लड़की से कौन शादी करता है। हफ्ता भी नही गुज़रा और एक दिन अब्बू ने decide कर लिया कि अब मुरादाबाद में नही रहना है किसी दूसरे शहर जाकर मेरी शादी करा देगे, पर अड़चने हर तरफ थी यहाँ आकर भी ऐसा कुछ नही हो पाया क्योंकि शादी के लिए लड़की की पूरी कुंडली निकालते हैं लोग और मेरे जैसी बदचलन से कोई शादी नही कर सकता।"
"मुझे तो सुनकर ही अजीब सा लग रहा है पता नही तुमने यह सब यहा कैसे होगा।" सना बोली।
"मेरे प्यार ने मेरा Rape कर लिया, बाप ने खुद इतनी चोटे देदी कि उस लड़के के दिए हुए ज़ख्म छुप गए, माँ को बस शादी करा के पीछा छुड़ाना था, भाई घिनौनी नज़र से देख रहे थे, शादी कोई करना नही चाहता था। मैने अल्लाह से बहुत तौबा करी कि मै ज़िना के करीब गई। ज़िना के करीब जाना भी गुनाह है ना इसीलिए मैने Rape का शिकवा भी नही किया क्योंकि मैने सोचा जब अल्लाह ने साफ मना किया है हराम रिश्तो और ज़िना से तो मै उसके पास गई ही क्यों, यह सज़ा मुझे मिलना ही चाहिए थी।
मैं तौबा करती रही पर मेरे हालात नही बदले। एक दिन यह सब सोच कर मै थक गई, उस दिन जैसे मै भूल गई कि मैने कितनी बड़ी गलती की है। मैं सीेधे अब्बू के पास गई और उनसे बोली कि मेरी ज़िंदगी में अब कुछ नही बचा है कम से कम मुझे आगे पढ़ने दें, Graduation कर लेने दे। जवाब में हज़ार ताने और एक झापड़ मिला। यह जानते हुए कि खुदखुशी गुनाह है और इससे जहन्नम में जाते हैं, मै भागती हुई Kitchen में गई और छुरी उठाकर अपने हाथ की नस काट ली क्योंकि जहन्नम में जाने वाला काम तो मै already कर ही चुकी थी, ऐसा काम जिसकी माफी भी नही होती क्योंकि अगर होती तो मेरे माँ-बाप मुझे माफ कर चुके होते।
गलती की या तो माफी होती है या सज़ा पर मुझे जितनी सज़ा मिल गई उसके बाद माफी की जगह नही थी।
आँख खुली तो अस्पताल के Bed पर मैं ज़िंदा थी, मुझे भयानक गुस्सा आ गया कि जब मेरी कोई ज़िंदगी नही है तो मुझे बचाया क्योंं। घर वालो से कोई बात नही हुई, शाम तक मै वापस घर आ गई। अगले दिन मैने फिर से वही कहा कि मेरी ज़िंदगी में और कुछ नही है मुझे पढ़ना है, अब्बू ने इस बार थोड़े कम कड़वे लहजे मे मना कर दिया। मुझे पता था कि इससे ज़्यादा क्या कर लेगे यह लोग, मार डालेगे? उसके लिए तो मै तैयार ही हूँ इसलिए मैने BBA करने की ज़िद शुरू कर दी। थोड़ी और पिटाई, हज़ार और ताने और एक और Suicide attempt लगा मेरे माँ-बाप को मेरी पढ़ाई के लिए मानने के लिए। मानने का मतलब यह नही था कि बेटा जाओ जैसे पहले थी वैसे पढ़ो जाकर, नही, अब मुझे बुर्का पहनना था, ज़ेवर की पाबंदी थी, Mobile भी लिया जा चुका था, अब्बू या भाई College छोड़ने आया-जाया करेगे और अगर वो Busy हैं तो उस दिन मैं नही जा सकती चाहे exam ही क्यों ना हो, और लड़को से इतनी दूरी जैसे वो exist ही नही करते। खैर इसके लिए तो मैने खुद क़ुरान शरीफ पर हाथ रख कर उन लोगो के सामने कसम खायी और कहा कि अगर आपको खबर भी मिले कि मैने किसी लड़के से बात की तो उसी दिन मुझे मार डालना। यह कसम मैने उनके लिए नही अपने लिए खाई थी। उन्होने HOD को सख्ती से कहा है कि यह किसी लड़के से Interact नही करेगी और ना Male Teacher इससे बिना वजह बोलेगे।"
"यार मारिया, हमारे तो समझ भी नही आ रहा कहें क्या हम? We are sorry." वो दोनो बोली।
"उन्होने कहा था कि Private कर लो, Distance कर लो लेकिन उन दो Suicide attempts के बाद मै अजीब बेखौफ हो गई थी। मुझे एक Normal लड़की की तरह college जाकर पढ़ना था, मैने उनसे कहा कि मैने गलती की आपने सज़ा देदी अब मुझे जाने दे और अगर सज़ा पूरी ना हुई हो तो रोज़ College से आने के बाद मुझे 100 डंडे मार लेना, और अगर गलती इतनी बड़ी है कि इतनी भी गुंजाइश नही है तो मौत की सज़ा दे दीजिए, मरने दीजिए मुझे।
पता है सना, रीना, इस हादसे ने मुझे सिखाया कि लड़कियों की गलती की माफी नही होती क्योंकि अगर बात Hotel जाने की और ज़िना करने की है तो वो तो फैज़ान ने भी किया था पर उसे किसी ने कुछ नही कहा, वो तो मस्त होगा अपनी ज़िंदगी में। खैर मुझे उससे क्या मतलब यार वो तो पराया था। मेरे घर वालो तक ने नही पूछा किस लड़के के साथ गई, क्यों गई, कौन था वो, क्योंकि उनके लिए इतना काफी था कि उनकी लड़की लड़के के साथ गई बस। अगर उस मोहल्ले वाले की जगह खुद अब्बू ने देखा होता तो शायद इतना नही होता, क्योंकि उसके देखने से अब्बू की इज़्ज़त मोहल्ले में नीलाम हो गई। अब्बू की नीलाम हुई, मेरी तो लुट गई थी। काश! अब्बू ने अपना शहर अपनी बेटी की इज़्ज़त लुटने की वजह छोड़ा होता।"
यह कहते ही मारिया रो पड़ी। उन दोनो ने उसका एक-एक हाथ पकड़ लिया। मारिया ने खुद को संभाला और बोली, "बस यही है यार मेरी ज़िंदगी, मेरी परेशानी। मैने तो इन सारी चीज़ो से बस यही समझा है कि हमारे मआशरे में लड़की को फरिश्ता समझा जाता है, वो एक इंसान की तरह गलती नही कर सकती। रीना, तुम लोगो में भी लड़की को लक्ष्मी कहते हैं ना? मतलब या तो आफत समझ कर पैदा होते ही मार देंगे या देवी समझ कर पालेगे, बस इंसान नही समझेगे उसे क्योंकि इंसान समझ लेगे तो उसे गलती करने का हक़ देना पड़ेगा ना। सच मे यार लड़कियों की गलतियों की माफी और कफ्फारा नही होता, कुछ नही होता।"
"यार मुझे तो ना इतनी समझ है ना इतना तजुर्बा कि मै इस पर कुछ Comment करूँ पर यार अल्लाह ग़फूरुर-रहीम है, तुम ने तौबा करी तो उसने तुम्हे माफ कर दिया होगा, और फिर तुम को इतनी सज़ा भी मिल चुकी है।" सना बोली।
इतनी बातो में रीना पहली बार बोली, "मैने तो इससे बस इतना समझा है कि लड़के भरोसे के लायक नही हैं चाहे वो शक्ल, आदत या किसी भी चीज़ में कितने भी अच्छे हो, मैं तो किसी लड़के से ऐसा Relation नही रखूँगी, सीधे शादी करूँगी। मुझे तो डर लग रहा है तुम्हारी बाते सुनकर।"
मारिया बोली, "मुझे नही लगता उसने मुझे माफ किया है क्योंकि अगर माफ किया होता तो वो अपने बंदो से भी मुझे माफ करा देता मगर उसके बंदो ने तो मुझे माफ किया नही।"
"तुम्हे किसी आलिम से बात करनी चाहिए, ऐसे अपनी ज़िंदगी गलतफहमी में और guilt की feeling के साथ ना गुज़ारो। मेरी नज़र में तुमने कुछ गलत नही किया है, उम्र के इस पड़ाव पर सबके पैर फिसल जाते हैं और फिर जो तुम्हारे साथ उस दरिंदे ने किया मेरी तो समझ कहती है तुम्हारे सारे गुनाह वहीं धुल गए होंगे।" सना बोली।
"बात तुम्हारी सही है लेकिन मैं बात नही कर सकती मेरे पास Mobile नही है और ना मै कहीं जा सकती हूँ।"
"अरे एक idea है, मेरे एक cousin हैं उन्होने आलिमत की है, उनसे मशवरा कर सकती हो।"
"कितने बड़े हैं वो?"
"मुझसे 4-5 साल बड़े हैं"
"मैने बताया ना लड़को से बात ना करने की कसम खायी है मैने, और ना भी खायी होती तो करती कैसे।"
"हम्म, तुम मेरा Mobile लेलो।"
"तुम मेरा कत्ल करवाना चाह रही हो तो ऐसे ही बोल दो"
"अरे यार"
सना और मारिया की यह बात चल ही रही थी कि तभी रीना बोली, "अरे सना तो तुम इसकी messenger बन कर अपने भाई तक बात पहुँचा दो ना और वो जो कहें इसे बता देना, simple."
"पर नही यार, ऐसे उन्हे पता चलेगा, पता नही फिर बात कितनी बड़ती चली जाएगी, छोड़ो, रहने दो।" मारिया बोली।
"अरे नही, ऐसा नही होगा, लोग उनके पास advice लेने आते रहते हैं वो कभी किसी का ज़िक्र तक नही करते। बहुत दीनदार हैं मेरे भाई, उन्हे पता है, किसी के राज़ को खोलना कितना बड़ा गुनाह है।" सना ने बताया।
मारिया मान गई। Recess भी खत्म हो गया था, तीनो class में जाने के लिए चल दी। रीना ने पूछा, "क्या तुम लोगो में बुर्का ऐसे ही ज़बरदस्ती पहनाया जाता है?"
सना जवाब देने लगी, "नही यार मुझे देख मै तो नही पहनती मेरे घर वाले तो कभी..."
मारिया उसकी बात काटते हुए बोली, "देखो यार मुझे मेरे घर वालो ने यह मेरी हरकत की वजह पहनाया यह सच है पर अगर यह नही भी होता तब मै खुद भी पहनती क्योंकि मै अपने मज़हब को Seriously लेती हूँ, कुरान मे अल्लाह ने औरतो को खुद को ढ़कने का हुक्म दिया है, और मुझे बुर्के से as in कोई परेशानी भी नही है, मै बुर्के में भाग भी सकती हूँ, गाड़ी भी चला सकती हूँ, पढ़ाई कर सकती हूँ, Doctor, engineer भी बन सकती हूँ, बुर्का मुझे कुछ करने से नही रोकता, रोकता यह समाज है। हाँ गर्मी लगती है बुर्के में लेकिन हम वो भी बर्दाश्त कर लेते हैं, पर गुस्सा पता कहाँ आता है, गुस्सा आता है कि उसी अल्लाह ने मर्दो को अपनी नज़रे नीची करने को भी कहा पर वो तो नही करते और इस बारे में कोई बात भी नही करता। अल्लाह ने दोनो को अपना-अपना काम दिया, सब नही पर 50% औरते तो तब भी ढकती हैं खुद को मगर मैने आज तक एक मर्द नही देखा जो नज़रे नीची कर के चले, शर्मिंदगी से कहती हूँ अपने अब्बू को भी नही देखा। यह महान लड़के रास्ते भर लड़कियाँ घूरते हुए घर पहुँचेगे और बहन को बुर्का पहनने को बोलेगे, अरे क्या फायदा फिर हमारे बुर्का पहनने का जब तुम हमे ऐसे घूरने वाले हो जैसे हम नंगी घूम रही हैं। अरे Hypocrisy की तो यह हद है क्या बताऊँ, देखो लड़को के लिए उनका सतर खोलना गलत है, नही खुलना चाहिए। सतर मतलब नाभि से लेकर घुटनो तक का हिस्सा पर वो तो चड्डी में बैठकर सबके सामने नहाएँगे किसी को कोई मतलब नही, लड़की के टखने भी दिख गए तो हाय तौबा।"
"अरे शांत गदाधारी भीम शांत, मैने तो बस ऐसे ही पूछ लिया था।" रीना माहौल को हल्का करते हुई बोली।
अगले दिन मारिया class में जाने के लिए जब corridor से गुज़र रही थी तो उसके कानो में आवाज़ आई, "यार मुझे सीमा बहुत पसंद है पर मै तो उससे बात तक नही कर पाता, क्या करूँ तू ही बता?" उसने गर्दन को झुकाए-झुकाए बस नज़रे ऊपर कर के देखा, वो वीर था। उसने बात एक कान से सुनी, दूसरे से निकाल दी और class में पहुँची। Class में सना उसका इंतज़ार कर रही थी, सना ने उसको एक पर्ची दिखाई, पर्ची पर लिखा था, "क़ाला रसूलअल्लाह, कुल्लू बनी-आदम खत्ताऊन व खैर-उल-खत्ताईन अत-तव्वाबून।" वो देकर सना बोली, "उन्होने यह कहने को कहा था पर मेरे समझ नही आया इसलिए मैं लिख लाई, इसका मतलब मुझे नही पता।"
"मुझे पता है, इसका मतलब है कि अल्लाह के रसूल ने कहा कि आदम की हर औलाद गुनाहगार या गलती करने वाली है और सबसे अच्छा गुनाहगार या गलती करने वाला वो है जो तौबा कर ले।"
यह पढ़ के वो बैठ गई, Lecture शुरू हो गए पर उसके दिमाग़ में यही एक जुमला घूम रहा था, वो यकीन करना चाह रही थी पर कर नही पा रही थी। उसे लग रहा था कि अगर ऐसा सचमुच है तो आज तक उसे Real life में ऐसा कुछ क्यों नही दिखा क्येंकि Real life में तो गलती करने वाला चाहे कितना भी तौबा कर ले और माफी माँग ले पर उसे ताने मिलते ही रहते हैं। वो सना के भाई से यह बात पूछना चाहती थी पर उसे अपनी कसम याद आ गई तो वो चुप बैठी रही। फिर उसे एक idea आया कि वो सना से इसका ज़िक्र कर देती है अगर उसने अपनी मर्ज़ी से अपने भाई से यह कह दिया तो बात बन जाएगी, कसम भी नही टूटेगी और उसे समझ आ जाएगा कि अल्लाह भी उसे यह बताना चाहता है, तो उसने ऐसा ही किया।
अगले दिन वही हुआ जो मारिया चाहती थी, सना आयी और बोली, "यार बुरा ना मानना पर तुम जो कल बात कर रही थी वो मैने अपने भाई से कही थी तो उन्होने कहा कि इस हदीस में रसूलअल्लाह ने जो गलती कर के तौबा करने वाले के अच्छे होने की बात कही है वो अल्लाह के नज़दीक अच्छे होने की बात है बंदो के नही क्योंकि तौबा इंसान अल्लाह से करता है बंदो से नही और वैसे भी एक इंसान हर इंसान की नज़र में ताउम्र अच्छा नही बन सकता। इसके अलावा अल्लाह और इंसान के माफ करने में भी फर्क है। देखो, शीशे का एक बर्तन अगर टूट जाए तो इंसान किसी भी तरीके से उसे जोड़ ले पर उसकी दरारे नज़र आती रहेंगी मगर मेरा अल्लाह उस बर्तन को ऐसा जोड़ता है कि पहले जैसा कर देता है, मानो वो कभी टूटा ही नही था। बस यही फर्क है इंसान और अल्लाह की माफी में।"
मारिया खुश थी, उसे अल्लाह की तरफ से एक इशारा मिल गया था कि तुम इस तरह अपने शक दूर कर सकती हो। मारिया का अल्लाह पर भरोसा कुछ अलग ही तरह का था, वो ऐसे ही अंदाज़े लगाती थी कि अल्लाह को उसका क्या काम पसंद है और क्या नही। इतना सब होने के बाद भी उसके मन मे यही ख्याल था कि अल्लाह ने उसके लिए कुछ तो सोचा होगा।
उसने खुद भी मज़हब की किताबे पढ़ रखी थी और उसने उन किताबो मे कहीं वो भेदभाव नही देखा था जो वो अपने समाज में देख रही थी। बस उसे इसी बात का गुस्सा था कि लोग इस्लाम को सिर्फ लड़कियों पर क्यों थोपते हैं खुद वैसे क्यों नही अमल करते। अल्लाह और अल्लाह के रसूल तो अच्छे मर्द की पहली निशानी भी यह बताते हैं कि वो मर्द अपनी औरत के साथ अच्छा हो पर असलियत मे ऐसा कुछ नज़र ही नही आता। हमारे समाज में तो कुर्ता-पायजामा पहने, सर पर टोपी लगाए मस्जिद जाने वाला मर्द ही अच्छा है, घर में चाहे औरत की वो एक ना सुने। यहाँ के मर्दो को तो बस यह पता है कि औरत के ज़िम्मे शौहर की खिदमत है, औरत के हुकूक जैसे कुछ हैं ही नही। शरियत में तो शादी के बाद औरत का अलग घर होना भी उसका हक है मगर यहाँ तो औरत अगर डर-डर के अलग घर को कहे भी तो उसे घर तोड़ने वाली चुड़ैल का दर्जा मिल जाएगा।
यह सब सोचते-सोचते मारिया फिर सना से बोली, "बात तो उन्होने सही कही पर पता नही आगे मेरी ज़िंदगी में क्या है, अल्लाह ने कुछ तो सोचा होगा मेरे लिए, क्योंकि इस पढाई के बाद मेरे अब्बू मुझे कोई Job तो करने देगे नही और शादी कोई मुझसे करेगा नही तो मेरा जाने क्या होगा।"
"अरे कोई होगा तेरे लिए भी यार, फिक्र मत कर, मैैने एक किताब पढ़ी थी 'पीर-ए-कामिल', उसमे लिखा था अच्छी औरतो के लिए अच्छे मर्द होते हैं। तेरे लिए भी कोई अच्छा लड़का होगा, Chill कर।" सना बोली।
मारिया को नही पता था कि वो अच्छी औरत है या नही।
रीना भी यह सब सुनकर बोली, "हाँ और क्या, मैं भी Pray करूँगी तेरे लिए, तू घबरा मत, हम लोग ढूँढेगे तेरे लिए अच्छा लड़का।" रीना हमेशा माहौल हल्का करने की कोशिश मे रहती थी।
मारिया को कभी-कभी फैज़ान का ख्याल भी आता था, पर वो उसे अपने दिमाग़ से झटक देती थी। अब वो उसके बारे में कुछ सोचना नही चाहती थी, वो उसे एक बहुत बड़ी गलती समझकर और उसकी की गई ज़बरदस्ती को अपनी सज़ा समझकर भूल जाना चाहती थी, सज़ा इसलिए क्योंकि उसका हमेशा से मानना था कि अल्लाह जो भी करता है किसी वजह के तहत करता है और उसे अपने साथ हुआ यह काम सज़ा के सिवा कुछ मालूम नही पड़ता। मगर दर्दनाक बाते भूलना ऊपर वाले ने इंसान की किस्मत में रखा ही कहाँ है।
कुछ दिन गुज़र गए और एक दिन सना मारिया से बोली, "इन दिनों मैं और फरहान भाई तुम्हारे बारे में बात कर रहे थे, तुम्हारे हर पहलू पर बात की हमने और कल उन्होने एक ऐसी बात कही जिसने मुझे बहुत खुश कर दिया। वो बोले कि वो तुमसे शादी करना चाहते हैं।"
मारिया को समझ नही आया कि यह खुशी की बात है या दुख की, वो Confuse थी, उसके मुँह से पहले अल्फाज़ निकले, "नही, नही, नही, वो मुझसे शादी नही मेरी हालत पर रहम कर रहे हैं, रहम का काम अल्लाह का है उसे करने दो।"
"वाह, कितने समझदार हैं मेरे भाई, उन्होने कहा था तुम यही बोलोगी। इसका जवाब उन्होने यह दिया है कि अल्लाह ने इस दुनिया को असबाब से जोड़ा है, मुझे अल्लाह के रहम का असबाब समझ कर कुबूल कर लो।अगर हाँ हो तो मैं तुम्हारी पढाई पूरी होते ही रिश्ता भेज दूँगा, या चाहो तो पहले भी भेज सकता हूँ।"
मारिया की आवाज़ नही निकली बस आँसू निकले, उसको यकीन नही हो रहा था कि एक मर्द उसके लिए यह बोलेगा वो भी सब जानते हुए। फिर भी उसने कुछ दिन का वक्त माँगा और एक दिन हाँ कर दी। वो पढाई पूरी होते ही शादी कर लेना चाहती थी इसलिए उसने 2nd Year पूरा होने तक रिश्ता भेजने को कहा। हाँ करते वक्त वो बस यह सोच रही थी कि दुनिया में सब मर्द एक जैसे नही हैं, कुछ फैज़ान जैसे दर्दनाक माज़ी देने वाले हैं तो कुछ फरहान जैसे उस माज़ी की फिक्र ना करते हुए लडकी को इज़्ज़त देने वाले भी हैं। या यूँ कह लो कि कुछ अल्लाह की सज़ा के असबाब हैं और कुछ अल्लाह की रहमत के।
मारिया बहुत वक्त बाद असल में खुश थी। आज उसका class में मन कुछ अलग ही तरह से लगा हुआ था।Lecture चल रहा था तभी अचानक Teacher ने गुलशन के बारे में पूछा कि वो आ क्यों नही रही है, तो नेहा ने बताया, "अरे Sir वो उसका B-Tech के एक लड़के के साथ affair था तो वो उसके घर वालो को पता चल गया इसलिए उन्होने उसकी पढाई छुड़वा दी, अब वो नही आएगी।"
"और वो लड़का?"
"जी वो तो आता है, वो तो लड़का है ना।"
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