'इससे मुश्किल और क्या हो सकता है?' यह ऐसा सवाल है जिसके हज़ार जवाब हैं लेकिन जब पूछा जाए तो मिलता एक नहीं। आजकल फैजान इसी सवाल से घिरा हुआ था। उसकी ज़िन्दगी का कुछ ऐसा हाल था कि वो करना कुछ चाहता था लेकिन कर कुछ और रहा था। जो उसने किया उससे दिल घुट रहा था और जिससे दिल संभल सकता था वो करना मुमकिन नहीं था। बेबसी की परिभाषा प्यार ने गुरु बनकर उसको ऐसे समझा दी कि अब सारी ज़िन्दगी दिमाग से ना निकलेगी। वो खुद से बस एक ही सवाल पूछ रहा था, 'इससे मुश्किल और क्या हो सकता है?' प्यार में किसी को खो देने से कठिन और क्या हो सकता है? उसको लग रहा था कि ज़िन्दगी में इससे मुश्किल कुछ नहीं होगा लेकिन फिर उसको किसी का लिखा एक शेर याद अाया,
"खुद पर इतना भरोसा, बंदे तुझे हुआ क्या है,
लेले किसी से मशवरा, इसमें बुरा क्या है।"
उसने सोचा कि क्यों ना लोगो की राय ली जाए कि उनके मुताबिक ज़िन्दगी में सबसे मुश्किल क्या है। फैजान एक ज्वाइंट फैमिली में रहता था इसलिए उसके पास लोग तो बहुत थे पूछने के लिए। वो सोच ही रहा था कि किससे पूछे तभी उसे उसका पांच साल का भतीजा छोटू दिखा, उसने छोटूं को बुलाकर एक टॉफी के बदले पूछा कि उसकी ज़िन्दगी में सबसे मुश्किल क्या है तो छोटू बोला, "स्कूल जाना भौत मूच्चिल है, मेला बिक्कुल मन नी होता, अम्मी ज़बरजस्ती भेजती है, जाना पत्ता है।" वो बोल ही रहा होता है जब तक उसका बड़ा भाई बब्लू आ जाता है और फैजान से वही पूछने की ज़िद करने लगता है जो छोटू से पूछा, तो फैजान उससे भी वही सवाल करता है कि सबसे मुश्किल काम ज़िन्दगी में क्या है। इस पर बब्लू बोला, "होमवर्क से मुश्किल तो कुछ भी नहीं, स्कूल तो चले भी जाओ लेकिन जो होमवर्क मिलता है वो नहीं हो पाता, बहुत कठिन होता है, करने का बिल्कुल मन नहीं होता लेकिन ना करो तो पिटाई होती है।" दोनो की बात सुनकर उसने दोनों को भगा दिया, उसे लगा इन लोगो से क्यों पूछा, बकवास जवाब दे गए फालतू के। फिर वो अपने छोटे भाई साहिल (जो कि 18 साल का है) को बुलाता है और उससे बातो बातो में पूछता है कि उसकी ज़िन्दगी में सबसे मुश्किल क्या है तो साहिल कहता है, "मुश्किल, मेरे लिए तो सबसे मुश्किल इस घर में रहना है, आप तो जानते हो मैं बाहर पढ़ने जाना चाहता था, एविएशन के लिए यहां कॉलेज नहीं है पर नहीं चाहे कुछ ना बन पायो ज़िन्दगी में, मन मार के जियो लेकिन यही रहो।" उसका थोड़ा सा दुख बाट कर फैजान अपने बड़े भैया के पास गया और उनसे भी यही सवाल किया, पहले तो उन्होंने टाला लेकिन आखिर बता ही दिया, "यार क्या बताऊं तुझे मैं, तू छोटा है समझेगा नहीं। घर वाले और तेरी भाभी सब पीछे पड़े हैं कि अब एक बच्चा होना चाहिए, दो साल हो गए शादी को, लेकिन उन्हें कैसे समझाऊं मैं अभी तैयार नहीं हूं ना दिमागी तौर पर ना आर्थिक तौर पर। मेरी तो समझ नहीं आता क्या करू, ऐसा नहीं है मुझे बच्चा नहीं चाहिए लेकिन उसको अच्छी ज़िन्दगी दे पाऊ तब तो, वरना क्या फायदा। बड़ा बेबस सा महसूस होता है।" उनकी बात सुनकर फैजान को लगा कि हां यह तो सचमुच बड़ा मुश्किल है, लेकिन अब क्या इससे भी कुछ मुश्किल होगा? इसके जवाब के लिए वो फिर अपने पापा के पास गया और उनसे पूछा। उसका सवाल सुनकर पापा बोले, "बेटा, इस दुनिया में कुछ भी मुश्किल नहीं, चाहो तो सब आसान है, बस करने कि ललक होनी चाहिए।" यह सुनकर फैजान ने कहा कि अगर करने के लिए कुछ अपने हाथ में हो ही ना ,तो? "तो सब उस खुदा पर छोड़ दो।", फैजान को पापा ने राय दी। फैजान को समझ आ गया कि पापा कुछ भी सही से नहीं बताएंगे इसलिए वो उसने बात करके अपनी आखरी उम्मीद दादा जी के पास गया और बोला, "मुझे आपसे कुछ बहुत ज़रूरी पूछना है, लेकिन मैं तभी पूछुगा अगर आप संजीगदी से जवाब दोगे।" दादा जी ने कहा हां बेशक पूछो, संजीदगी से जवाब दूंगा। फिर उसने दादा जी से भी वही सवाल किया तो उन्होंने ने जवाब दिया, "देखो बेटा, ज़िन्दगी में कोई एक चीज सबसे मुश्किल नहीं है, मैंने इतनी ज़िन्दगी जी है तो मैं कह सकता हूं के उम्र के हर पड़ाव पर कुछ नया ही सबसे मुश्किल होता है, जब मैं बच्चा था तो स्कूल जाना मुश्किल था, फिर काम करना स्कूल का, उसके बाद एक लड़की पसंद आयी उससे दूर रहना मुश्किल लगा, शादी के बाद एडजस्ट करना, बच्चो का तो क्या ही बताऊं और अब जब मैं बूढ़ा हो गया हूं तो मन का खाना खा पाना सबसे मुश्किल हो गया है।" दादा जी ने गंभीर बात को थोड़ा हल्का बनाकर पेश कर दिया और फैजान को समझ भी आ गया। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का वो शेर फैजान के दिमाग में दौड़ने लगा,
"और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा,
राहते और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा।"
वो दादा जी के कमरे से निकल रहा था तभी पापा आए, फैजान चला गया लेकिन पापा वहीं बैठ गए और बात करने लगे। दोनो ने एक दूसरे को बताया कि फैजान ने उनसे क्या पूछा तो दादा जी बोले, "ज़रूर उसके साथ कुछ हुआ है, मेरा तजुर्बा तो कहता है मोहब्बत हुई है, खैर तुम्हे जितना जानता हूं तुमने कोई सही जवाब नहीं दिया होगा, या ये कहूं दे नहीं पाए होगे, मैं समझ सकता हूं अपने बच्चे को ये बताना कितना मुश्किल है कि आगे क्या मुश्किलें आने वाली हैं, मैंने भी उसे आगे का कुछ नहीं बताया, काश बता सकते लेकिन नहीं बता सकते।"
पापा ने दुख के साथ बस हां में सर हिला दिया।
उधर फैजान कहीं गया ही नहीं था, वहीं दरवाज़े के किनारे खड़े होकर बाते सुन रहा था, उसको असली जवाब अब मिला था कि दुनिया में सबसे मुश्किल बेबसी है, चाहे वो कैसी भी हो, मन मारकर स्कूल जाने की, समझ में ना आते हुए भी होमवर्क करने की, जों पसंद ना हो वो पढ़ाई करने की, किसी को पसंद करते हुए उससे दूर रहने की, तैयार ना होते हुए भी बच्चे को दुनिया में लाने की, या अपने बच्चे से आने वाली मुश्किलों को छुपाने की।
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