रहीम जी ने कहा था,
"रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोए,
सुनि इठलैहे लोग सब, बांटी ना लेहे कोए।"
और लोग कहते हैं कि एक दूसरे से बात करने से मन हल्का होता है, सुकून मिलता है। बाते दोनो ही अपनी अपनी जगह सही हैं लेकिन हम कौन सी माने? हमने तो लोगो पर विश्वास किया और उनसे मन की बात कही तो कुछ से सुकून पाया कुछ से धोका। अब कुछ लोग कहेंगे कि सबको ना बताओ, अपने खास जो लोग हैं बस उनसे बात करो वो दुख बांट लेंगे। अब यही तो दुविधा है कि कौन अपना और कौन पराया। अपनों को पराया होने और परायो के अपना बनने में वक़्त ही कहां लगता है।
तो मेरा तो यह मानना है कि इंसान को अपने मन की बात को उससे करना चाहिए जिससे मन कहे करने को, बाकी उस इंसान पर छोड़ दो वो बदले में क्या देगा। जो दिल दुखाता है उसकी वजह किसी से ना कहना और जो दुख बांटता है उसके कारण सबसे कहते फिरना, मेरी नजर में दोनो ग़लत है।
आपका क्या कहना है?
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