बहुत पुराने समय की बात है, एक लड़का शिक्षा ग्रहण करके अपने घर लौटने वाला था, आज उसका आखिरी दिन था। वह अपने गुरु का सबसे प्रिय शिष्य था इसलिए उन्होंने उससे दीक्षा मांगने के बजाए एक वर मांगने को कहा तो शिष्य बोला, "वैसे तो आपका आशीर्वाद ही सबकुछ है किन्तु आप कहते हैं तो मैं मांगता हूं, मैं यह वरदान चाहूंगा कि मैं अपना रूप जब चाहूं तब बदल पाऊं।" यह सुनकर गुरु आश्चर्यचकित हो गए पर वर तो देना ही था तो उन्होंने कहा, "मैं तुझे वरदान देता हूं कि तेरे दिमाग में जो भी छवि हो तू उसका रूप ग्रहण कर सकता है।" इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा, "मुझे नहीं पता तूने ये वर क्यों मांगा लेकिन पुत्र मेरी एक बात हमेशा ध्यान रखना, रूप बदलने से भाग्य नहीं बदलता। "
इसके बाद वह लड़का अपने घर आ गया। घर दुल्हन की तरह सजा हुआ था, सबने उसका स्वागत किया। वह घर आने से भी ज़्यादा उस वरदान के मिलने से खुश था, लेकिन उसे यह नहीं पता था कि घर में हुई ये सजावट केवल उसके घर वापस आने की खुशी में नहीं बल्कि उसकी शादी के लिए है। उसकी मां ने बताया, "बेटा तिलक, पण्डित जी ने तेरे लिए एक योग्य कन्या बताई थी, और तेरे वापस आने के बाद दूसरा दिन शुभ मुहूर्त बताया था इसलिए कल तेरी शादी है।" तिलक उस लड़की को जानता था इसलिए उसने साफ मना कर दिया यह कह कर कि उसे इस लड़की से शादी नहीं करनी लेकिन उसकी मां ने कहा कि उसे ये शादी कर लेनी चाहिए और करनी ही पड़ेगी क्योंकि यही उचित है, पण्डित जी का फैसला गलत नहीं हो सकता। तिलक दौड़ता भागता उस लड़की से मिलने पहुंचा कि उसे मना कर सके लेकिन उसे किसी ने मिलने नहीं दिया। अब वह बड़ा परेशान था कि क्या करे, सोचते सोचते अगला दिन हो गया, उसे जो करना था आज ही करना था वरना उसे शादी करनी पड़ेगी। अंततः उसने सोचा, "मैं यहां से कहीं दूर चला जाता हूं तभी बच पाऊंगा" लेकिन कोई उसे घर से बाहर भी नहीं निकलने दे रहा था क्योंकि सबको पता था कि वह शादी के विरुद्ध है। फिर उसे याद आया कि वह अपनी रूप परिवर्तन शक्ति का प्रयोग करके बच सकता है। उसने अपने बड़े भाई का रूप लिया और दर्पण देखा वह बिल्कुल उन जैसा लग रहा था, अब वह दबे पांव घर से निकला, उसने सोचा कि अब कुछ दिन अपना रूप लूंगा ही नहीं ताकि कोई मुझे ढूंढ ना पाए। वह इस सोच में मग्न जा ही रहा था कि किसी ने उसे अचानक रोका और कहा, "कहां घूम रहे हो, इतने दिन हो गए अभी तक तुमने पूरी राशि वापस नहीं की, तुम्हारे घर जाकर बताएं कि जुंए में कितना हार चुके हो, तभी मिलेगा अब शायद हमारा धन।" यह सुनकर वह चौंक गया लेकिन उसके समझ नहीं आया कि बोले क्या तो वह भाग खड़ा हुआ, वो आदमी उसके पीछे भागा, भागते भागते एक जगह छुप कर उसने उस ही आदमी का रूप ले लिया और चुपके से निकल गया। वह बहुत घबरा गया था और अपने बड़े भाई पर गुस्सा भी आ रहा था लेकिन वह कर भी क्या सकता था, तभी अचानक एक अधेड़ उम्र के आदमी ने उसके पैर पर डंडा मारते हुए कहा, "तुझसे कहा था ना कि एक बार मेरी बेटी को ले गया तो मेरे घर के आस पास भी दिखाई मत देना, भूल गया या पिटने अाया है।" और तिलक कुछ कह पाता उससे पहले उसके चार डंडे और पड़ गए, जैसे तैसे वो अपनी जान बचाकर भागा। आगे जाकर उसने किसी और का रूप लिया तो नई मुसीबत में फंसा, फिर रूप बदला तो मुसीबत बदली।
एक महीना बीत गया भागते भागते, उसे अपने भाग्य पर रोना आ रहा था कि जानें किस घड़ी सुनीता से शादी ना करने के लिए भागा और भागा तो भागा रूप बदल कर भागा, इससे अच्छा तो अपने ही रूप में भागता कम से कम आगे जाकर पकड़ जाता लेकिन इस मुसीबत से तो बच जाता। अब तिलक ने सोचा कि अपने असल रूप में वापस अपने गांव चला जाए और माफी मांग कर उस लड़की से शादी करले। उसे अपने इस विचार से याद आया कि गुरु जी ने सत्य ही कहा था कि रूप बदल सकते हो लेकिन भाग्य नहीं। किन्तु अब एक परेशानी हो गई थी तिलक ने अपना रूप लेने की कोशिश की पर उसे अपना चेहरा याद ही नहीं आया, वह भूल गया कि उसका मुख है कैसा, उसके बहुत सोचने पर भी उसे अपनी छवि याद नहीं आ रही थी। उसे याद भी नहीं था कि आखिर बार उसने दर्पण में अपना चेहरा कब देखा था। तिलक दहाड़ मार कर रोने लगा, बहुत देर रोया। खुद के लिए वो तिलक था लेकिन दूसरों के लिए तो कोई और ही था, उसने आखिरी बार जिस व्यक्ति का रूप लिया था उसी रूप में वह अपने गांव गया, इस उम्मीद में कि शायद अपने माता पिता को विश्वास दिला सके कि वही तिलक है और सिर्फ शादी से बचने को भागा था ना कि जीवन भर के लिए। वह अपने गांव की सरहद पर ही था कि दो चार लोगो ने कहा, "अरे देखो बंसी, ऐ बंसी क्या रेे तुझे सब ढूंढ रहे हैं और तू यहां मटरगश्ती कर रहा है, चल।" और उसकी कोई बात सुने बिना उसे पकड़ कर ले गए। वह घर पहुंचा तो वहां शादी का माहौल था, बंसी की मां तिलक को पकड़ कर अन्दर ले गई और बोली, "देख बेटा, मुझे मालूम है तू शादी नहीं करना चाहता था लेकिन अब जब बारात यहां ले आए हैं तो कर ही ले, सबके मान का प्रश्न है, मैं तेरे आगे हाथ जोड़ती हूं, और तेरे बारात के कपड़े क्या हुए, यह कैसे पुराने से कपड़े हैं?" तिलक को लगा शायद बंसी की मां सही कह रही हैं, उसने अपनी मां का तो दिल दुखा कर पाप किया था अब शायद बंसी की मां का दिल रखकर कुछ पुण्य कर पाये इसलिए उसने कहा, "हां मैं शादी करूंगा, और कपड़े वो मैंने एक भिखारी से बदल लिए थे ताकि कोई मुझे पहचान ना पाए, लेकिन मैं भूल गया था व्यक्ति अपने भाग्य से भाग नहीं सकता।" इसके बाद शादी की विधि शुरू हो गई, पर उसके दिमाग़ में बस यह चल रहा था कि कहीं बंसी वापस ना आ जाए। इस बीच उसने सिंदूर लगाने के लिए जब दुल्हन का घूंघट उठाया तो देखा कि यह तो वही लड़की थी जिससे उसकी शादी होने को थी और वो भाग गया था। उसे ऊपर वाले की लीला देखकर हसीं आ रही थी। शादी संपन्न हुई और उसके बाद सुहागरात का समय आया, जहां तिलक ने सुनीता को पूरी बात समझाई और उसे उसी का रूप लेकर यकीन दिलाया। सुनीता हैरान भी थी और गुस्सा भी लेकिन तिलक के माफी मांगने और समझाने पर बड़ी मुश्किल के बाद मान गई।
अगले दिन सुनीता के कहने पर वो दोनो तिलक के गुरु के पास इस समस्या के समाधान के लिए गए। उसके गुरु ने मुस्कुराकर कहा, "मुझे पता था तेरा चंचल मन तुझसे ऐसा कुछ करवाएगा लेकिन मैंने इसीलिए नहीं रोका क्योंकि अनुभव ही व्यक्ति का श्रेष्ठ गुरु होता है।" तिलक ने पूछा, "लेकिन इसमें मेरे मां बाबा की क्या गलती थी जो उन्हें यह अपमान सहना पड़ा।" तो गुरु जी ने बताया, "पुत्र, यह उनका भाग्य था जो बदल नहीं सकता था, तू सिर्फ इसका कारण बना और रही बात समाधान की तो तू फिलहाल बंसी बनकर उसके घर में रह और इस दौरान बंसी को ढूंढ और उसके परिवार से मिलवा, उसके बाद सुनीता को लेकर अपने घर चला जा, इसमें कठिनाई होगी लेकिन यही तेरा पश्चाताप है, और अपने चेहरे की चिंता ना करना, तू जब अपने घर पहुंचेगा तो तेरी मां तुझे तेरे असली रूप को वापस लाने में सहायता करेगी क्योंकि एक मां से बढ़कर कोई संतान की रूप रंगत को नहीं जानता।"
इसके बाद वह दोनो गुरु जी का धन्यवाद करके अपने घर लौट गए।
Book : I have never been (Un)happier Author : Shaheen Bhatt Year. : 2018 Genre : Non-Fiction 'I have never been (Un)happier' , this Non-fiction book is basically about depression, but before going into book review let me tell you about the author. Shaheen Bhatt has written this book, Yes I know Bhatt Surname sounds familier, and you guessed it right, she is sister of Alia Bhatt and Daughter of Mahesh Bhatt and Soni Razdan. The reason behind telling you that she is sister of a bollywood star and belong to a well known family is only to clarify that depression can happen to anyone, like literally to anyone. This book does the same thing, it tells you that how a privileged person can also face mental issues and suffer. Shaheen Bhatt has written her experience from begining to the very day, that how her struggle with depression started and how she fought back. This book contains her few handwritten notes and photos but the book itself is not just ...
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