मैं हूं शौविक, और मै एक "इल्यूजनिस्ट" हूं, इल्यूजनिस्ट का मतलब तो समझते हैं ना आप, जादूगर। मैं कोई टोपी से खरगोश निकालने वाला जादूगर नहीं बल्कि लोगों को खरगोश बना देने वाला जादूगर हूं। बना देने से मेरा मतलब सचमुच बना देना नहीं लेकिन उन्हें ऐसा लगता है कि वो बन गए। इसी को तो जादू कहते हैं, जो होता है वो दिखे ना और जो दिखे वो हो ना। मैंने अपने परिचय में 'इल्यूजनिस्ट' शब्द का इस्तेमाल बस इस ही लिए किया क्योंकि इसका मतलब होता है भ्रम में डालने वाला, यही मेरा काम है, लोगों को भ्रम कराना कि कुछ हो रहा है या वो कुछ और हैं। मेरे बारे में इतना जानना काफी है क्योंकि यह कहानी मेरी नहीं है लेकिन मुझे याद रखियेगा। यह कहानी श्री मिथ्या की है जिनकी डायरी मुझे कल एक बस में मिली। उस डायरी में काफी कुछ लिखा था लेकिन जितना ज़रूरी है उतना आपको बताता हूं।
" 03/12/2015
मेरे जीवन में जो हुआ उस पर कोई विश्वास नहीं करेगा। मेरे पास इसको लिख देने के अलावा और कोई चारा नहीं है। काश एक दिन कोई मुझे समझ पाए और मेरे सवालों के जवाब दे पाए।
मुझे लिखने का बहुत शौक है, इसलिए मैं एक कहानीकार बनना चाहता था, लेकिन मुझे हार से हमेशा बहुत डर लगता था इसलिए आजतक नहीं लिख पाया यह सोचकर कि वो किताब नहीं चली तो क्या होगा? कैसी किताब लिखूं, एक उपन्यास या एक लघु कथा?
शायद एक लघु कथा ही सही रहेगी , जितनी छोटी किताब उतना कम डर। लेकिन डर तो था और मैं इतना भी डर बर्दाश्त करने की शक्ति नहीं रखता था तो मैंने एक रास्ता चुना किताब के सफल होने के लिए। मैंने एक तांत्रिक कि मदद ली, मैंने उससे कहा कि कुछ ऐसा जादुई करो की मेरी किताब हिट हो जाए जिसके बदले मैंने उसे एक बड़ी रकम दी। मुझे मालूम है ऐसा करना सही नहीं था लेकिन मैं अपने डर के हाथो मजबूर था। मेरे इस डर ने मुझसे क्या करा दिया था यह मुझे बहुत बाद में समझ आया।
मैंने कहानी लिखी, अपनी प्रेम कहानी, मेरी और मेरी प्रेमिका रचना के बारे में। जो जैसा हुआ था वैसा लिखा ईमानदारी से, कि कैसे हम मिले, प्यार हुआ, इकरार हुआ, शादी हुई और एक नन्ही सी परी ने आकर हमारी ज़िन्दगी को जादुई बना दिया। यह कहानी लिख लेने के बाद मैंने उसे पढ़ा, एक बार, दो बार, दस बार, इतनी बार पढ़ने के बाद मुझे वो बहुत सरल और नीरस लगने लगी। मैंने सोचा लोग मसाला पढ़ना पसंद करते हैं तो इसमें कुछ बदलाव करूं कि लोग पढ़ना चाहे, कुछ दर्द हो, ग़म हो और खत्म होते होते रुला दे।
फिर मैंने रात में बदलाव करना शुरू किए।
'मैं रचना से कॉलेज में मिला था, हमारी प्रेम कहानी में कोई बाधा नहीं थी, ना घर वाले ना समाज लेकिन ऐसा भी कैसे हो सकता था कि इतना सब आसानी से हो जाए, कुछ तो होना ही था और वो हुआ हमारी शादी से दो महीने पहले। हम करीब थे, इन नजदीकियों ने ही सब बिगाड़ दिया, एक दिन वो प्रेगनेंट हो गई और मुझे उसने बताया भी नहीं। इस बात से अंजान मैं किताबे पढ़ने में व्यस्त था, जो किताब मैं पढ़ रहा था उसी किताब में एक ख़त रखा मिला, जिसमें लिखा था, ' मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूं मिथ्या, लेकिन तुम मुझे जानते हो मैं बदनामी बर्दाश्त नहीं कर सकती, यार मैं प्रेगनेंट हो गई हूं, अब दो में से एक काम होगा, या तो मैं बदनाम हूंगी या एक कातिल बनूंगी, नहीं मिथ्या मैं नहीं कर पाऊंगी यह। यह मत कहना कि कुछ वक़्त में हमारी शादी है तो घबराना क्या, जब सात महीने में ही बच्चा होगा तो लोग क्या क्या बाते बनायेंगे हमारे बारे में और हमारे घर वालो के बारे में तुम सोच भी नहीं सकते, मैं जा रही हूं मिथ्या।' मैंने उसे ढूंढने की बहुत कोशिश करी लेकिन वो नहीं मिली, मुझे तो लगा शायद उसने आत्महत्या कर ली। लेकिन ऐसा हुआ नहीं था, कुछ वक़्त बाद एक दिन मेरे घर की घंटी बजी, दरवाज़े पर बहुत बुरी हालत में रचना खड़ी थी, मैं बिना किसी सवाल के पहले उसे अस्पताल लेकर गया, वहां उसने एक लड़की को जन्म दिया। मेरे मन में बहुत सारे सवाल थे, सोचा था उससे सब पूछूंगा लेकिन डॉक्टर ने बताया कि रचना कि हालत बहुत खराब है लगता है उसकी इस स्तिथि में बिल्कुल भी देखभाल नहीं हुई है, और फिर वो मुझे सारे सवालों के साथ छोड़ कर चली गई। एक नन्ही सी रचना मेरे हाथ में थमा कर हमेशा के लिए चली गई। ना जाने उसने ऐसा क्यों किया था? शायद मेरे प्यार में ही कमी होगी। मेरी ज़िन्दगी उथल पुथल हो गई, लेकिन सब कुछ बुरा होने के बावजूद मैं खुश था क्योंकि मेरे पास छोटी रचना, परी थी'
यह बदलाव कर लेने के बाद मैं सो गया। सुबह जब मेरी आंख खुली तो काफी देर हो गई थी, रचना और मेरी बेटी परी दोनों उठ चुके थे, मैंने दोनों को बुलाया लेकिन किसी की आवाज़ नहीं आयी। मैं बेड से उठ ही रहा था तभी परी भागती हुई आकर मुझसे चिपट गई मैंने उससे पूछा मम्मी कहां हैं, तो वो बोली आपके और मेरे दिल में, मुझे यह सुनकर हसी आ गई , मैंने कहा हां हां वहां तो हैं ही लेकिन अभी कहां हैं, चाय बनाई या नहीं? तो वो मुझे ऐसे देखने लगी जैसे मैंने कुछ गलत बोल दिया हो, और बोली मम्मी तो भगवान जी के पास हैं ना। मैं झुंझला गया और उसपर चिल्ला पड़ा तो वो रोने लगी। मैं कुछ सोच पाता तभी मेरी नजर कमरे में लगी रचना कि तस्वीर पर पड़ी जिसपर माला डली हुई थी। मैं घबरा गया कि यह क्या हो रहा है। मैंने फोटो पर से माला हटाई और रचना को घर में ढूंढना शुरू किया लेकिन वो नहीं मिली। परी मुझसे लगातार कह रही थी कि पापा आपको क्या हो गया है आपने कोई बुरा सपना देखा है क्या मम्मी का, आप मम्मी को ढूंढ क्यों रहे हो, वो तो भगवान जी के पास हैं। मैंने रचना के पापा को कॉल लगाई तो पता चला वो मुझसे नाराज़ हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी बेटी मेरी वजह से मरी, ना मैं उसे शादी से पहले प्रेगनेंट करता ना उसका यह हाल होता। मैं चौंक गया कि यह तो बिल्कुल वही हो है जो मैंने कहानी में लिखा था, रचना मर गई , मेरी एक छोटी बेटी है और सब मुझसे नाराज़ हैं लेकिन मैं डरा नहीं, मुझे समझ आ गया कि यह उस तांत्रिक की कारस्तानी है, उससे मैंने क्या करने को कहा और उसने क्या ही करके रख दिया, यह तो बिल्कुल उन भूतिया कहानियों जैसा हो गया कि जो लिखा वो हो गया लेकिन मैं अपनी ज़िन्दगी को भूतिया नहीं बनने दूंगा। मैं कहानी बदलकर सब सही कर सकता था लेकिन फिर मैं कहानीकार कैसे बनता, मेरी कहानी हिट कैसे होती और मैं मशहूर कैसे होता। मुझे पता था यह सब कैसे हुआ है और इसे कैसे सही करना है इसलिए फिर मै उसके पास गया।
जिस जगह वो मिला था वहां मैं पहुंचा लेकिन वहां उसका नाम ओ निशान नहीं था, मैंने उसे बहुत ढूंढ़ा पर वो नहीं मिला, मुझे बहुत गुस्सा अा रहा था तभी पीछे से आवाज़ अायी, ' शौविक को ढूंढ रहे हो क्या?' मैंने पीछे देखा तो मेरी ही उम्र का एक आदमी खड़ा था, मैंने कहा, नहीं मैं एक तांत्रिक को ढूंढ रहा हूं जिसने मेरी ज़िन्दगी उजाड़ दी। तो वह बोला, आप जिस तांत्रिक की बात कर रहे हैं वो दरसअल कोई तांत्रिक नहीं बल्कि एक जादूगर है जिसका नाम शौविक है, नहीं मैंने गलत कहा, सिर्फ जादूगर नहीं एक बहुत अच्छा और पागल जादूगर है। ऐसा जादूगर जो बस कामयाब होना चाहता है उसे यह मतलब नहीं है कि, . . . . मैंने उसे बीच में रोकते हुए कहा, पहले बताओ तुम कौन हो और ये सब कैसे जानते हो? तो उसने बताया कि उसका नाम एंजेल है और वो शौविक का दोस्त था, लेकिन शौविक के इस पागलपन कि वजह से उनकी दोस्ती टूट गई। फिर मैंने उसे पूरी बात बताई जो हुआ था, और उससे पूछा कि अगर वो जादूगर है तो उसने यह कैसे कर दिया कि मैंने जो लिखा वो सच हो गया? तो उसने जो मुझे बताया उस पर मुझे यकीन नहीं हुआ, उसने कहा कि "शौविक को सिर्फ एक चीज सबसे बेहतर तरीके से आती है और वो है भ्रमित करना यानी तुम्हे जो लग रहा है कि हो रहा है वो तुम्हारा भ्रम है। उसने यह भ्रम बनाया है कि तुम जो लिखो वो सच हो ताकि लोगों को तुम्हारी कहानी से हमदर्दी हो और तुम्हारी कहानी हिट हो, लेकिन असल में ऐसा कुछ नहीं है, यह बात साफ साफ समझलो कि तुम्हारी कहानी अगर अच्छी है तो हिट होगी उसे कोई जादू हिट नहीं करा सकता।" मुझे उसकी किसी भी बात पर यकीन नहीं हो रहा था तो मैंने उससे कहा कि साबित करो जो तुम कह रहे हो वो सच है। उसने मुझे यह पता लगाने का एक रास्ता बताया कि तुम्हारे भ्रम में वो लोग हैं जिनका तुमने कहानी में ज़िक्र किया है, तो जाओ किसी ऐसे इंसान से पूछो जिसे तुम्हारे बारे में सब पता हो लेकिन उसके बारे में तुमने कहानी में ना लिखा हो, वो तुमको सच बताएगा, और हां यही इकलौता तरीका भी है भ्रम से बाहर निकलने का कि तुम्हे कोई यकीन दिलाए कि तुम भ्रम में हो, जिस पल तुम्हे यकीन होगा उसी वक़्त भ्रम टूट जाएगा।
मुझे पता था मुझे किसके पास जाना है, मैं सीधे अपने पुराने दोस्त उज़ैर के पास गया। मैं उससे बहुत वक़्त बाद मिल रहा था, वो मुझसे बहुत गर्मजोशी से मिला और मुझे परेशान देखकर बोला, क्या हुआ सब ठीक है ना? भाभी और परी ठीक है ना? उसका यह सवाल सुनकर मैं बहुत खुश हो गया कि एंजेल सही कह रहा था, वो सिर्फ एक भ्रम था। मैंने कहा, हां वो दोनो ठीक है, अब सब ठीक है। कुछ देर रुककर मैं घर के लिए दौड़ा। घर पहुंचा तो रचना और परी घर में मौजूद थे लेकिन रचना मुझसे बहुत नाराज़ थी वो कह रही थी, "अगर तुम चाहते हो मैं मर जाऊं तो मार दो ना मुझे, मेरी तस्वीर पर माला चड़ा कर और ऊट पटांग कहानी सुनाकर लोगो के सामने क्या साबित करना चाहते हो, तुमने मेरे दोस्तो के सामने यह बकवास क्यों करी?" मैं समझ भी रहा था और नहीं भी, मैंने रचना को सब बताया कि ऐसा ऐसा हुआ तो वो मुझसे और गुस्सा हुई कि, "उस जादूगर और आपमें क्या फर्क है, वो भी कामयाब और मशहूर होने के लिए गलत कर रहा है और आप भी, आपको शर्म नहीं आयी आत्मकथा में मेरे बारे में इतना बेहूदा लिखते हुए?" मैंने उससे माफी मांगी और वादा किया कि अब मैं सब सच लिखूंगा, सब कुछ सच सच।'
यह डायरी पढ़कर मैंने फौरन कॉल करी उस नंबर पर जो पहले पन्ने पर लिखा था, मैंने सोचा मिथ्या से बात करूं लेकिन फोन किसी और ने रिसीव किया तो मैंने कहा कि आपकी डायरी मुझे बस में मिली आप वापस ले लीजिए। मैं उससे एक कॉफी शॉप में मिला, मैंने पूछा कि इस डायरी पर तो मिथ्या का नाम है तो आप कौन हैं? तो उसने बताया कि वह मिथ्या का दोस्त है और मिथ्या ने यह डायरी उसे पढ़ने के लिए दी इसलिए उसने अपना नंबर डाल दिया कि कहीं खो ना जाए। फिर मैंने उसे अपना नाम और काम बताया और पूछा कि यह मिथ्या ने मेरे बारे में क्यों लिखा है मुझे बदनाम करना चाहता है क्या, उसकी पर्सनल डायरी में मेरा नाम क्यों है मैं तो उसे जानता तक नहीं? तो उसने बताया कि यह उसकी कोई पर्सनल डायरी और आपबीती नहीं बल्कि एक कहानी है, मिथ्या एक लेखक है एक कहानीकार है, अब यह एक बस इत्तेफाक है कि इसमें जादूगर है जिसका नाम शौविक है बिल्कुल आपकी तरह, और आपको यह डायरी मिल जाना सचमुच बहुत बड़ा इत्तेफाक है। तो मैंने कहा कि यह ज़्यादा नहीं हो गया कुछ , मुझे तो यकीन नहीं हो रहा। फिर उसने जो जवाब दिया उससे मैं बहुत हद तक संतुष्ट हो गया, उसने कहा, "देखिए, शौविक नाम का मतलब ही होता है जादूगर, और यह लेखक लोगो के लिए बहुत ज़रूरी होता है कि वो एक एक नाम सोच समझ कर रखे, एक जादूगर का नाम ऐसा रखा जिसका मतलब ही जादूगर हो तो यह बड़ी बात नहीं है आप चिंता ना करे, यह कहानी काल्पनिक है, आपका नाम कहीं खराब नहीं होगा यह मेरी जिम्मेदारी है मैं सिर्फ उसका दोस्त नहीं पब्लिशर भी हूं इसलिए तो यह डायरी है मेरे पास।" यह सब बताकर और डायरी लेकर वो चला गया।
फिर मैंने वही अपने दोस्त रहस्य को बुलाया और यह सब बताया। वह भी हैरान था यह सुनकर कि इतना बड़ा इत्तेफाक हुआ।
रहस्य - यह तो सच में बहुत बड़ा इत्तेफाक है यार, इसपर तो कहानी लिखी जा सकती है।
मैं - कहानी तो लिखी जा सकती है लेकिन यह कोई इत्तेफाक नहीं है।
रहस्य - इत्तेफाक नहीं है? लेकिन अभी तुमने ही तो बताया कि उस आदमी की कहानी में तुम्हारा चरित्र है बिल्कुल।
मैं - हां है लेकिन वो मैं ही हूं, वो कहानी काल्पनिक नहीं है, और यह बात वह पब्लिशर भी नहीं जानता। वो मिथ्या मेरा राज खोलना चाहता है अपनी कहानी से, सबको बताना चाहता है कि मैं कौन हूं, क्या हूं।
रहस्य - मतलब तुमने सचमुच ऐसा किया था। तो तुम डायरी लेकर उस पब्लिशर के पास क्यों चले आए, और एक मिनट, तुमने डायरी दे भी दी उसे, पागल हो क्या अब तो वो तुम्हारा पर्दा फाश कर ही देगा।
मैं - अरे ऐसे कैसे, वो अगर मिथ्या है तो मैं भी शौविक हूं, एक बार बर्बाद होते होते बच गया तो इस बार नहीं बचेगा। मुझे यही तो देखना था कि यह डायरी में सब लिखा क्यों है।
रहस्य - लेकिन तुम अब करोगे क्या, डायरी तो चली गई और कहानी छप भी जाएगी ,....फिर?
मैं - फिर, फिर मेरा काम शुरू होगा। किताबे छपेंगी लेकिन किसी तक पहुंचेगी नहीं उसे लगेगा कि उसने जो चाहा हो गया, किताब छप गई वो कामयाब और मशहूर हो गया, लोगो ने मुझे पहचान लिया और मैं पकड़ गया, लेकिन ऐसा कुछ होगा नहीं। इस बार ऐसा भ्रम बनाऊंगा कि कोई एंजेल उसे बाहर नहीं निकाल पाएगा। बेचारा बर्बाद भी होगा और उसका पछतावा भी नहीं कर पाएगा।
हा हा हा हा हा !!!!!
रहस्य - बाप रे!!!!
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें