जब मैं बाल्यावस्था मे था तब मैं अपने मित्रो के साथ बहुत सारे खेल खेलता
था जैसे क्रिकेट, छुपनछुपाई, चोर-सिपाही, कोड़ा-जमाल, पिट्टू-गरम, खो-खो
इत्यादि पर अब जब से मोबाईल फोन हाथ में आया है तो सिर्फ कैंडी-क्रश,
एंग्री-ब्रड, पोकेमॉन गो आदि खेलता हूँ और वो भी अकेले। बचपन में मैं अपने
मित्रो के घर जाता और हमलोग घंटो तक बाते करते, और वह बाते मुझे आजतक याद
हैं, पर अब मोबाईल फोन से व्हाटस ऐप पर बस लिख-लिख कर बाते होती हैं, किसी
का चेहरा नही दिखता किसी की मुस्कान नही दिखती, दिखती है तो बस स्माइली।
यह वो समय है जब मोबाईल फोन तथा अन्य यांत्रिक उपकरण हमारी जीवन शैली का एक
महत्बपूर्ण अंग बन चुके हैं, किंतु मोबाईल फोन एक ऐसा उपकरण है जिसे बच्चो
से लेकर व्रद्ध तक सभी उपयोग करते हैं। मोबाईल फोन की लोगो को ऐसी लत लग
चुकी है कि लोग इसके बिना रह नही पाते। मैं मोबाईल फोन का विरोधी नही हूँ
लेकिन वो कहते हैं ना कि, “अति तो अच्छाई की भी अच्छी नही होती।”
आज आपको एक भी ऐसा व्यक्ति नही मिलेगा जिसके पास मोबाईल फोन ना हो। एक दिन
के लिए किसी का मोबाईल फोन खराब हो जाए तो वह कहते हैं, “बिना मोबाईल फोन
के जीवन सूना-सूना है।” , “ऐसा लग रहा है जैसे गोद का बच्चा छिन गया हो।” ,
“ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने हाथ काट लिए हों।” अविश्वसनीय आकर्षण है
मोबाईल फोन का परन्तु ऐसे समाज में जब आप कुछ समय बिना मोबाईल फोन के
व्यतीत करते हैं अथवा कुछ ऐसे लोगो को देखते हैं जो अपना अधिकतर समय बिना
मोबाईल फोन के व्यतीत कर रहे हैं तब समझ आता है कि हमने अपने वास्तविक जीवन
को कितना पीछे छोड़ दिया है।
मैं जिस विश्वविद्यालय में पड़ता हूँ वहाँ मोबाईल फोन लाना वर्जित है।
आरम्भिक दो वर्षो तक मैं विश्वविद्यालय के परिसर मे ही छात्रावास में रहा
तथा उन वर्षो में मुझे लगा कि यह सही नही है पर तृतीय वर्ष में मैंने कुछ
ऐसा अनुभव किया कि मुझे लगा कि मोबाईल फोन ना लाने से कितना लाभ है। अब मैं
बस से यात्रा करता हूँ और उस बस में कोई भी मोबाईल फोन नही लाता। मैं
प्रतिदिन पाँच घण्टे की यात्रा करता हूँ उन पाँच घण्टो में मैं वास्तविक
जीवन का अनुभव करता हूँ। क्योंकि कोई भी मोबाईल फोन नही लाता तो सब एक
दूसरे से वार्तालाप करते हैं, मज़ाक करते हैं। कोई इयरफोन नही लगाए होता,
सब एक दूसरे को सुनते हैं। कोई व्हाटस ऐप चैट नही करता सब एक दूसरे को
देखकर बात करते हैं। उनको हँसते हुए देखना तथा एक दूसरे की आँखो में आँखे
डालकर बाते करते देखना बहुत अच्छा लगता है।
यह बात मैं अपनी दादी को बताऊँ तो वह कहेंगी कि इसमें कौन-सी बडी बात है सब
ऐसे ही तो बात करते हैं लेकिन हम जानते हैं कि आज क्या परिस्तिथि है। लोग
कहीं उपस्थित होकर भी उपस्थित नही होते। बात करते लोकिन दृश्टि कहीं और
होती है। ऐसे में जब आप लोगो से ऐसे मिलते हैं तो हृदय प्रफुल्लित हो उठता ह
Book : I have never been (Un)happier Author : Shaheen Bhatt Year. : 2018 Genre : Non-Fiction 'I have never been (Un)happier' , this Non-fiction book is basically about depression, but before going into book review let me tell you about the author. Shaheen Bhatt has written this book, Yes I know Bhatt Surname sounds familier, and you guessed it right, she is sister of Alia Bhatt and Daughter of Mahesh Bhatt and Soni Razdan. The reason behind telling you that she is sister of a bollywood star and belong to a well known family is only to clarify that depression can happen to anyone, like literally to anyone. This book does the same thing, it tells you that how a privileged person can also face mental issues and suffer. Shaheen Bhatt has written her experience from begining to the very day, that how her struggle with depression started and how she fought back. This book contains her few handwritten notes and photos but the book itself is not just ...
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