सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

दृष्टिकोण - पार्ट 2

Disclaimer

यह एक series की पहली कहानी का दूसरा Part है। Series होते हुए भी हर कहानी को अलग-अलग पढा जा सकता है तथा हर कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।

                               वीर_द_डूड

क्लास में लगभग हर लड़की मुझसे बात करना चाहती है, पर वो नही करती जिससे मैं करना चाहता हूँ, पता नही क्यों। पहले सेमेस्टर के आखिर की बात है तब से मैं उसे पसन्द करता हूँ और अब चौथा सेमेस्टर आ गया है। उसका नाम सीमा है, और शायद वो मेरी सीमा से बाहर है, हाहा, सॉरी बैड जोक। खैर इस बीच मेरी कई लड़कियों से बात हुई, जिससे बात करो वो जाने क्या समझती है प्रपोज़ कर देती है यहाँ तक की सीमा की फ्रेंड नेहा ने भी यही किया। ऐसा नही है कि यह लड़कियाँ अच्छी नही हैं, पर पता नही क्यों मुझे बहुत ज़्यादा अजीब सा महसूस होने लगता है। सच कहूँ तो एक अजीब सा डर लगता है, डर किस बात का मुझे नही पता। शायद इस बात का कि इनके साथ हो गया तो सीमा से बात कैसे करूँगा, या शायद इस बात का कि मेरी आज़ादी छिन जाएगी। कई लड़कियों ने चैट में कहा तो मैंने वहाँ उन्हे मना कर दिया लेकिन जिन लड़कियों ने मिलकर कहा उनके सामने तो मुझसे कुछ बोला ही नही गया, ऐसा लगने लगा जैसे मैं विक्रम हूँ और मेरे ऊपर बेताल चड़ने वाला है तो वहाँ से भाग गया। हाहा, ओके सॉरी, अगेन बैड जोक, पर सच कुछ ऐसा ही था, मिलता-जुलता। उसको समझाने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। पर हाँ उसके बाद मेैंने उन लड़कियों से बात भी नही की या बहुत कम करदी क्योंकि मैं किसी को हर्ट नही करना चाहता था।
मेरे बारे में बहुत बात हो गई अब उसकी बात करते हैं जिसके लिए मैं यह लिख रहा हूँ। एक दिन मैंने रीसेस में सोचा सीमा के पास जाऊँ और कुछ बात करूँ। बड़ी हिम्मत करके क्लास के दरवाज़े तक पहुचाँ तो देखा कि वो नेहा के साथ बैठी थी। मैं रुक गया क्योंकि वो लोग कुछ बात कर रहे थे। क्लास के बाहर से तो कुछ सुनाई नही दिया मैं जब अन्दर बड़ा तो सीमा बोली, "अरे मैं तो बस यह कह रही थी कि मुझे तो वो सही लगता है"। मुझे देखते ही वो दोनो चुप हो गईं। ना जाने किसके बारे में बात हो रही थी, मुझे एक सेकेण्ड को तो बुरा लगा और फिर अगले ही सेकेण्ड लगा क्या पता मेरे ही बारे में बात हो रही हो। मेरे भी कुछ समझ में नही था तो मैं लेक्चर का पूछने लगा कि अगला कौन-सा है। इधर-उधर की बात करके मैं बैठ गया। उस दिन घर जाकर मैंने सोचा कि आज तो बात करना ही है, सामने तो होने से रही व्हाटस्ऐप ही एक सहारा है। मैंने टाइप किया, "हाय सीमा, आई एम वीर" और तब ही मेरी नज़र पड़ी कि वो ऑनलाईन थी, मेरी हिम्मत जवाब देने लगी पर मैेने बस आँखे बन्द करके सेंड पर क्लिक कर दिया। तीन-चार सेकेण्ड बाद जब आँखे खोली तो मैसेज सीन हो चुका था। मैंने घबराकर स्क्रीन बन्द कर दी और मोबाईल को दूर रखकर उसके बोलने का इंतज़ार करने लगा। हाईस्कूल के रिज़ल्ट की भी इतनी घबराहट नही हुई थी जितनी उसके रिप्लाई की हो रही थी। और रिप्लाई आया, "हाय" मैंने भी बिना वेट किए दूसरा मैसेज किया  और बात शुरू हुई, बस दस मिनट चैट हुई और उसने गुड नाईट बोल दिया। बात क्या हुई याद नही लेकिन बात हुई यही बहुत बड़ी बात है। सिर्फ दस मिनट की उस चैट ने मुझे इतना खुश कर दिया कि मैं बता नही सकता। अगले दिन के आने के इंतज़ार में मैने जल्दी से आँखे बन्द की ताकि बस सुबह हो और मैं मिलकर उससे बात कर पाऊँ।
अगले दिन कॉलेज पहुँच कर मेरी सारी एक्साइट्मेन्ट हवा हो गई। उसने मेरी तरफ देखा तक नही। मैंने सोचा था वो देखेगी, स्माइल पास करूँगा फिर जाकर उसके पास बैठ जाऊंँगा और बात करुँगा पर ऐसा कुछ नही हुआ। मैं उस दिन निराश ही घर लौट आया पर फिर पता है क्या हुआ, मैं उम्मीद भी नही कर सकता था वो हुआ, उसकी कॉल आ गई। यही तो ज़िन्दगी है ना शायद, हमारी सोच से बिल्कुल परे। मैंने फोन रिसीव किया लेकिन कुछ समझ नही आ रहा था कि कहना क्या है मुझे तो जो मुँह में आया बोल दिया, "मैं कई दिन से तुमसे बात करने की कोशिश कर रहा था पर वो नेहा हर वक्त तुम्हारे साथ रहती है और आज तो बैक टू बैक लेक्चर की वजह से..." " कल मिलती हूँ मैं तुमसे" वो बीच में बोली और फोन काट दिया। मैं तो एक दम पागल सा होने लगा, उसने खुद बोला कल मिलते हैं। मुझे मालूम है ज़यादा कोई उम्मीद नही करनी चाहिए पर दिल को कौन रोके।
फिर दूसरे दिन सुबह हमारी मुलाकात हुई, मेरी धड़कन मुझे सुनाई दे रही थी और मेरे दिमाग़ में बस एक ही बात चल रही थी, "प्लीज़ वो ना पूछना, प्लीज़ वो ना पूछना" और उसने वही पूछा, "हाँ तो क्या बात करना थी आपको?" मैं तो पगला ही रहा था तो मैंने भी हड़बड़ाहट में बोल दिया, "नही अरे वो मतलब कोई खास ज़रूरी बात नही करना थी, बस बात करना थी।" और बेशक उसने मेरे इस बेवाकूफी भरे वाक्य का मतलब पूछ लिया, तो मैंने कहा कि लंच मे मिलकर बात करते हैं अभी क्लास शुरू होने वाली है।
हमारी बाते होने लगी, धीरे-धीरे बढ़ने लगी, वो बहुत क्यूट बाते करती थी, उसकी हर एक बात मुझे पसन्द थी, रात में उसका बात करते-करते सो जाना, उसका बेकार जोक्स पर हँसना और अच्छे जोक्स समझ ना आना, उसकी हँसी तो ऐसी कि देखने वाला भी हँसने लगे, वो उसका छोटी-छोटी बातो पर रोना और बड़ी-बड़ी बातो पर बड़ो की तरह समझना और समझाना, उसका सब कुछ कमाल का था। सब कुछ ठीक था फिर एक दिन उसका मैसेज आया, "वीर, तुम मुझे हमेशा से बहुत पसन्द हो, पर समझ नही आता तुम्हे कहूँ क्या, मेरे दोस्त भी पूछ रहे थे कि क्या वीर तुम्हारा बीएफ है, तो तुम बताओ क्या मैं उनसे बोल दूँ कि हाँ वीर मेरा बॉयफ्रेंड है?" यह पढ़कर मुझे खुशी हुई बहुत खुशी हुई लेकिन अगले ही पल खुशी डर में बदल गई, अजीब से ख्याल आने लगे, "मैं तो इस रिश्ते में बँध जाऊँगा, मैं अगर उसका ख्याल नही रख पाया तो, दो दिन में ही हमारा ब्रेकप हो गया तो, मैं यह नही कर सकता, मैं यह कर ही नही पाऊँगा, वो मुझे समझेगी कैसे, मैं उसे कैसे समझूगाँ" और हज़ारो ऐसे ही अटपटे ख्याल तभी मैंने नोटिस किया कि मुझे पसीना आ रहा है। मैं उसको मैसेज भी नही कर पाया और बिस्तर में दुबक कर सो गया।
मैं कॉलेज पहुँचा, कल की बात मेरे दिमाग़ में चल रही थी मैं खुश होना चाहता था लेकिन यह अजीब-ओ-गरीब ख्याल मेरा पीछा नही छोड़ रहे थे। सीमा आयी और हाथ पकड़कर कैफे ले गई, मैैं कई बहाने बनाता रहा पर उसने एक नही सुना, वो बोली, "टेल मी, यह हमारे बीच क्या है? क्या तुम मेरे लिए सीरियस हो या नही? तुम मेरे बॉयफ्रेंड हो या नही, सब क्लियर करो अभी।" मैं उस वक्त उसे पकड़कर चूम लेना चाहता था और कहना चाहता था कि हाँ मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ और हमेशा तुम्हारे साथ रहना चाहता हूँ लेकिन मेरा दिमाग़ और मेरी बॉडी कुछ और कह रही थी। उसने मेरा हाथ पकड़ रखा था, उस वक्त मुझे सीमा से डर लग रहा था, इतना डर की मैं कँपकपाने लगा, पसीना आना शुरू हो गया। उसके बाद उसने क्या कहा मुझे कुछ नही पता, मेरा दिमाग़ सुन्न सा हो गया था, मैं वहाँ से उठ कर चला और सीधे एचओडी सर के पास गया और उनसे छुट्ठी लेकर घर आ गया।
घर आकर मैं तबीयत खराब का कहकर सो गया, और फिर जब उठा और रिलैक्स हुआ तो मैंने सीमा को मैसेज किया, "मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ सीमा, मुझे माफ कर दो मैं ऐसे चला आया पर मेरे साथ कुछ प्रोब्लम है, शायद मैं बीमार हूँ, मुझे खुद नही पता क्या पर कुछ तो है, अगर तुम्हे मुझ पर यकीन है तो प्लीज़ मुझे कुछ वक्त देदो, आई वाना बी विद यू बट आई नीड टाईम।" मैसेज सीन हुआ लेकिन रिप्लाई नही आया, मुझे बहुत बुरा लगा पर मैं समझ रहा था वो गुस्सा होगी। मैंने दूसरा मैसेज नही किया पहले मुझे खुद को समझना था कि यह हो क्या रहा है। मैंने सोचना शुरू किया, बाकी लड़कियों से बचकर भाग जाना या उनसे कम्फर्टेबल ना होना समझ आता है लेकिन सीमा से तो इतना प्यार करता हूँ मैं फिर यह डर क्यों है। मुझे रोना आ रहा था क्योंकि मैं आज खुद को समझ नही पा रहा था, आज मुझे खुद पर शक हो रहा था। मुझे धीरे-धीरे सब बातें याद आ रही थी, क्यों मैंने सीमा को प्रपोज़ नही किया, क्यों आज तक मेरा कोई रिलेशन नही रहा, क्यों कोई मुझे छूता भी है तो भयानक अहसास होता है। मैेंने बहुत सोचा तब कुछ अहसास हुआ कि शायद मुझे किसी से रिश्ता बनाने में डर लगता है, मैंने गूगल किया तो पता चला यह सच में एक फोबिया होता है। फोबिया ऑफ कमिट्मेन्ट भी होता है और फोबिया ऑफ इन्टीमिसी भी। इतनी इन्फोर्मेशन मिली पर यह समझ नही आया कि मुझे क्या है? मुझे पता था गूगल पर पूरा भरोसा करना भी बेवकूफी है तो मैंने सोचा मुझे सायकाईट्रिस्ट के पास जाने की ज़रूरत है। लेकिन सायकाईट्रिस्ट कोई क्लीनिक खोले थोड़ी बैठे होते हैं, वो मिलेगे कहाँ। फिर मुझे याद आया कि मेरे चाचा की एक दोस्त हैं जो शायद सायकाईट्रिस्ट हैं या ऐसा ही कुछ करती हैं, दिमाग़ की डॉक्टर हैं, मुझे पक्का नही पता पर वो शायद कुछ बता पाएँ। अब उनका नम्बर चाहिए था, मैंने बहाने से चाचा का मोबाईल लिया और नम्बर निकाला, उनका नाम काजल था। मैंने बात करी और मुझे कल सुबह की अपॉइंटमेन्ट मिल गई।
अगले दिन मैं कॉलेज के बहाने से निकला और डॉ काजल के पास पहुँचा और हद मेरी किस्मत उन्होने मुझे पहचान लिया। मैं भूल गया था कि वो घर आ चुकी हैं। मैंने उनसे रिक्वेस्ट करी की वो मेरे घर पर कुछ ना कहें, मैं सीरियसली बहुक परेशान हूँ और मुझे मदद चाहिए है। वो बहुत हम्बल थी उन्होने मेरी बात समझी और अपनी परेशानी बताने को कहा। "दरअसल बात यह है कि मेरा आजतक किसी लड़की के साथ कोई रिलेशन नही रहा, मेरा मन हुआ कि करूँ पर कर नही पाया, मुझे प्रपोज़ल भी मिले, तब मुझे खुश होना चाहिए था पर मुझे अजीब ख्याल आने लगते और डरा सा फील होता था, मुझे लगा शायद मैंने गलत लव स्टोरी वाली फिल्मस् देख ली हैं यह उनका असर है। फिर कुछ वक्त पहले मुझे एक लड़की से प्यार हुआ, मेरे क्लास मे ही है वो, मेरी उससे बात होती है पर इस लड़की को भी मैं रिलेशन के लिए नही पूछ पाया और जब उसने पूछा तो मैं समझा नही सकता क्या हुआ, मैं उससे बात नही कर पाया, हाँ बोलना चाहता था नही बोल पाया। सब अजीब सा हो गया है, कैसे बताऊँ, यह समझ लीजिए कि ऐसा लगता हैै जैसे एक इन्सान को पहाड़ बहुत पसन्द हैं वो वहाँ जाना चाहता है उनकी ऊँचाई को महसूस करना चाहता है पर वहाँ पहुँचने के गोल-गोल रास्तो के बारे में सोच कर ही उसे चक्कर आते हैं तो वहाँ जाना और ऊँचाई पर पहुँचना तो बहुत दूर की बात है। मैं उस लड़की से बहुत प्यार करता हूँ तो ऐसा क्यों है, क्या आप कुछ बता सकती हैं?" मैंने यह सब उन्हे समझाया तो वो बोली, "सिर्फ अजीब थॉट्स आते हैं या इसका बॉडी पर भी कोई असर पड़ता है मतलब कँपकपी, साँस सही से ना आना, कहीं दर्द फील होना या और कुछ?" तो मैंने उन्हे बताया कि, "शुरूआत में मैंने नोटिस नही किया था पर हाँ जब भी कोई लड़की रिलेशन बनाने की बात करती है तब कँपकपी होती है, पसीना आने लगता है और इस लड़की के  मामले में तो दिमाग़ भी जैसे सुन्न सा हो गया था, शायद उसने मेरा हाथ पकड़ रखा था इसलिए।"
यह सुनकर वो कुछ देर चुप रहीं और उठ कर गई और एक किताब में कुछ ढ़ूँढ़ने लगी, दो मिनट बाद आकर बैठी और बताया, '"बेटा, तुम्हे फोबिया ऑफ कमिटमेंट, गेमोफोबिया और शायद फोबिया ऑफ इन्टीमिसी भी है, आई एम नॉट कम्पलीटली श्योर। गेमोफोबिया फियर ऑफ मैरिज होता है, मैं हैरान हूँ कि तुम्हे यह अभी से कैसे फील हो रहा है यह लोगो को तब समझ आता है जब उनकी शादी की उम्र आती है और शादी के लिए उन्हे फोर्स किया जाता है। तुम्हे यह है और वो भी इस लेवेल का, मैंने गेमोफोबिया का एक केस पहले देखा है पर वो एक चालीस साल के इन्सान का था, कभी इतनी कम उम्र का नही देखा, अब तुम यह कहो कि मेरी शादी कि बात तो आयी नही तो गेमोफोबिया नही फोबिया ऑफ कमिटमेंट होगा तो मैं तुम्हे बता दूँ कि इन दोनो फोबियाज़ में ना के बराबर फर्क है बल्कि कुछ सायकाईट्रिस्ट तो इन दोनो को एक ही मानते हैंं। इन दोनो में फ्रक बस यह है कि गेमोफोबिया पूरी ज़िन्दगी की कमिट्मेंट का डर है और फोबिया ऑफ कमिट्मेंट किसी भी तरह की कमिट्मेंट का डर होता है। तुम्हे गेमोफोबिया है  यह मैंने इसलिए कहा क्योंकि तुम्हारे फिज़िकल सिमटम्स गेमोफोबिया वाले हैं।"
मैं चुपचाप बैठा सुन रहा था, मैंने तो इतने बड़े शब्द सुने भी नही थे कभी तो मेरे समझ में सब आना तो दूर की बात थी,  वो फिर से उठी और किसी को फोन लगाकर बात करने लगी।
फोन रखकर वो मुझसे बोली, "देखो बेटा मुझे पता है तुम सोच रहे होगे कि मैं क्या बोले जा रही हूँ, क्या मुझे खुद ही नही पता कि यह क्या है तो हाँ सच में मैं पूरी तरह श्योर नही हूँ, मैं तुम्हे और कन्फयूज़ नही करना चाहती, तुम कल इसी वक्त फिर से आना,ओके।"
मैं कल फिर से उनसे मिलने गया तो वहाँ एक कोई और आदमी भी था। आज सारी बातचीत उस इन्सान ने करी और डॉ काजल बस पास बैठी सुनती रहीं। उसने जो जैसा पूछा मैंने सब बता दिया, उसे लगा शायद मेरा पहला कोई बुरा अनुभव है या शायद मेरे माँ-बाप का तलाक हुआ पर मैंने उसे साफ-साफ बता दिया कि ना मेरा खुद का कोई बुरा अनुभव हेै और ना मेरे घर में ऐसा कुछ हुआ। उस इन्सान ने  लगभग डेढ़ घंटा बात करी, सब कुछ समझा और इस नतीजे पर पहुँचा कि मुझे गेमोफोबिया और फोबिया ऑफ इन्टिमिसी दोनो हैं। मैं बुरी तरह घबरा गया, मुझे यकीन नही हो रहा था, मैं रोने लगा, और रोते-रोते मैंने पूछा क्या इसका कोई इलाज नही है तो वो बोले, "देखो रिश्तो के मामले में तुम एक सीरियस इन्सान हो इसलिए तुम हर रिश्ते को लाईफ टाईम के लिए मानते हो यह अच्छी बात है पर गेमोफोबिया होने की वजह से तुम वो रिश्ता अपना नही सकते, और अगर जैसे तैसे अपना भी लिया तो इन्टिमिसी का फोबिया तुम्हारा जल्दी पीछा नही छोड़ेगा, डगर तो लम्बी है मुश्किल भी है पर नामुमकिन नही है। थेरेपी के सेशन लेना पड़ेंगे, हिम्मत से काम लेना होगा और हाँ लेकिन यह तुम्हारे अकेले के बस की बात नही है यह तुम उसके साथ ही आसानी से कर पाओगे, तुम उस लड़की से प्यार करते हो ना और वो तुमसे, तो बस, प्यार में बहुत ताकत होती है, तुम दोनो डॉ काजल के पास आना यह समझा देंगी सब ओके, दुनिया में हर परेशानी का हल होता है, डोन्ट वरी।"
मैं उनसे अलविदा लेकर चला आया, बहुत दुखी था पर एक बात की खुशी थी कि सीमा मेरे साथ है, कल जाकर मैं उसे सब समझा दूँगा फिर हम धीरे-धीरे अपना रिश्ता बनाएँगे
बेशक पहाड़ पसन्द हैं और पहाड़ो के रास्ते से डर भी है लेकिन जब साथ प्यार हो तो इन्सान कोई भी ऊँचाईयां छू सकता है, सारे डरो को हरा सकता है।
अगले दिन मैं कॉलेज गया, खुद की भी मिक्स फीलिंगस् थी और उसका भी पता था कि वो थोड़ा गुस्सा है, मैंने सोचा मना लूँगा, सब समझा दूँगा, पर मुझे नही पता था कि मुझे कुछ नही पता। मैं उसका इंतज़ार कर रहा था, और वो आई, पर अकेले नही ध्रुव के साथ उसके हाथ पकड़े, और जाकर एक साइड में बैठ गई, मैं उसके लिए अब था ही नही। मैं जैसे मन ही मन में चिल्ला रहा था, "अरे इधर तो  देखो, मैं यहाँ हूँ, मैं तुम्हारे लिए हर डर को हराने को तैयार खड़ा हूँ, बस तुम्हारा साथ चाहिए है, इधर तो देखो।"
पर उसने नही देखा, मेरी हिम्मत भी टूट गई, दिल भी और मैं भी।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

REVIEW : I HAVE NEVER BEEN (UN)HAPPIER

Book    : I have never been (Un)happier Author : Shaheen Bhatt Year.    : 2018 Genre  : Non-Fiction 'I have never been (Un)happier' , this Non-fiction book is basically about depression, but before going into book review let me tell you about the author. Shaheen Bhatt has written this book, Yes I know Bhatt Surname sounds familier, and you guessed it right, she is sister of Alia Bhatt and Daughter of Mahesh Bhatt and Soni Razdan. The reason behind telling you that she is sister of a bollywood star and belong to a well known family is only to clarify that depression can happen to anyone, like literally to anyone. This book does the same thing, it tells you that how a privileged person can also face mental issues and suffer. Shaheen Bhatt has written her experience from begining to the very day, that how her struggle with depression started and how she fought back. This book contains her few handwritten notes and photos but the book itself is not just ...

अनुगच्छतु प्रवाहं

Disclaimer यह एक series की तीसरी कहानी है। Series होते हुए भी हर कहानी को अलग-अलग पढा जा सकता है तथा इस कहानी में लिखे गए सारे स्थान वास्तविक हैं परंतु पात्र तथा घटनाएँ काल्पनिक हैं। कृपया पूरी कहानी पढ़े बिना कोई राय ना बनाएँ। सिकन्दर हर हाल में समुद्र किनारे पहुँचकर Sunrise देखना चाहता था इसलिए Taxi Driver पर चिल्ला रहा था, "अरे यार जल्दी करो, पहुँचा दो दुगुना किराया दे दूँगा बस तुम भगा लो, कोई Shortcut हो तो लेलो।" और Driver हाँ हाँ करके बस हड़बड़ाहट में गाड़ी भगाए जा रहा था तभी अचानक सामने एक आदमी आ गया, Driver ने पूरी जान लगाकर Steering Wheel घुमाया और उस आदमी को बचाया। वो आदमी तो बच गया लेकिन सिकन्दर का सर अचानक किसी चीज़ से टकरा गया। सिकन्दर ड्राइवर पर चिल्लाया, "अबे क्या कर रहा है साले, मारेगा क्या, अगर मैं मर जाता ना, तुझे छोड़ता नही।" "अरे, अचानक सामने पता नही कौन पागल आदमी आ गया" Driver बोला। सिकन्दर जल्दी से उतरा और देखने लगा कि कौन था, बीच रोड पर वो आदमी अभी भी वैसे ही खड़ा हुआ था। सिकन्दर उसके पास गया और बोला, "अरे भाई, ठीक तो हो ...

इससे मुश्किल और क्या हो सकता है?

'इससे मुश्किल और क्या हो सकता है?' यह ऐसा सवाल है जिसके हज़ार जवाब हैं लेकिन जब पूछा जाए तो मिलता एक नहीं। आजकल फैजान इसी सवाल से घिरा हुआ था। उसकी ज़िन्दगी का कुछ ऐसा हाल था कि व...