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दृष्टिकोण - पार्ट 1

Disclaimer

यह एक series की पहली कहानी का पहला Part है। Series होते हुए भी हर कहानी को अलग-अलग पढा जा सकता है तथा हर कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।

                         आई_एम_लिमिटलेस      

"वो प्लेबॉय है, उसके चक्कर में ना पड़ना।" नेहा ने मुझको समझाते हुए कहा। "तुझे पता भी है वो कैसा है, उसे सिर्फ लड़कियों से चिकनी-चुपड़ी बाते करना आता है, और तू ठहरी संजीदा किस्म की।" "अरे मैं तो बस यह कह रही थी कि मुझे तो वो सही लगता है", मैं बोली। यही बातें चल रही थी कि तब ही वीर वहाँ आ गया और हम लोग चुप हो गए। रीसेस खत्म होने वाला था, इस समय तो वीर को अपने दोस्तो के साथ होना चाहिए था तो यह यहाँ क्या कर रहा है,  हम दोनो ने एक-दूसरे से आँखो-आँखो में पूछा। वीर ने अचानक बात करना शुरू कर दी। नेहा को वो बिल्कुल अच्छा नही लगता था पर मुझे वो बहुत पसन्द था और एक अच्छा इन्सान लगता था इसलिए मैं यह समझ नही पा रही थी कि इतना नेक दिल लगने वाला इन्सान प्लेबॉय कैसे हो सकता है।
रीसेस खत्म हुआ और मैं कॉलेज पूरा करके घर आ गई, घर आकर भी मैं वीर के ही बारे में सोच रही थी। वैसे पिछले कुछ महीनो से मेरा यही रुटीन था, कॉलेज में उसे देखना और घर में उसके बारे में सोचना। वीर मुझे बहुत पसन्द था, शायद प्यार ही था मुझे वीर से लेकिन मैंने वीर के बारे में आजतक किसी लड़की के मुँह से अच्छा नही सुना था इसलिए कभी कोई कोशिश नही की। ऊपर से नेहा भी हर दूसरे दिन वीर से दूर रहने की चेतावनी देती रहती है। कभी-कभी तो लगता है शायद नेहा भी वीर को पसन्द करती है इसलिए मना करती है।
मुझे कुछ तो करना है, लेकिन क्या, कुछ समझ नही आ रहा, पर मैंने सोच लिया है कि वीर से बात करूँगी और खुद समझूँगी कि वो कैसा है। वैसे सच कहूँ तो मुझे खुद नही पता कि मुझे उससे प्यार-व्यार है या बस वो दिखने मे अच्छा है इसलिए मैं पगला रही हूँ।
बड़ी हिम्मत करके मैंने कॉलेज के वॉट्सऐप ग्रुप से वीर का नम्बर निकाला और टाईप किया, "हाय वीर, आई एम सीमा", और सोच में डूब गई कि सेंड करूँ ना करूँ। यह पहली बार नही था जब मैं ऐसे कुछ लिखकर बैठी थी, पर आज मेरा इरादा कुछ पक्का था। तभी मोबाईल बोला, वीर का मैसेज आया था, "हाय सीमा, आई एम वीर" यह देखकर तो मेरी हवाईंयाँ उड़ गईं क्योंकि चैट खुली हुई थी और मैसेज आते ही सीन हो गया था। दो मिनट तक मैंने कुछ नही किया, बस सोचती रही कि "वो क्या सोच रहा होगा मेरे बारे में, उसने मुझे मैसेज क्यों किया है, मैं रिप्लाई करूँ या नही, बोलूँ कि मैं मैसेज करने जा रही थी कुछ काम से, हे भगवान, क्या करूँ।" फिर आखिरकार मैसेज किया, "हाय" उधर से फौरन रिप्लाई आ गया, "कैसी हो" थोड़ी देर बातें होती रहीं और गुड नाइट बोल दिया गया। कोई खास बात नही हुई लेकिन आज अचानक बहुत खास महसूस हो रहा था। आम-तौर पर सुकून के लिए आँखे बन्द करना पड़ती थी पर आज पता नही क्यों आँखे खुले रखने पर ज़्यादा सुकून मिल रहा था।
अगले दिन कॉलेज पहुँचते ही मैं नेहा को सब बताना चाहती थी लेकिन मुझे पता था नेहा क्या बोलेगी, पर इतनी खुशी मैं अपने अन्दर रोक भी नही पा रही थी। अचानक पीछे से आकर किसी ने मेरी आँखे बन्द करीं और मेरे मुँह से अपने-आप ही निकल पड़ा, "वीर"। वो हाथ जो मेरी आँखो पर थे अचानक कन्धो पर गए और मुझे पकड़ कर घुमा दिया, सामने नेहा खड़ी घूर रही थी। मैं सकपका गई, मेरे कुछ समझ नही आया और मेरे मुँह से शब्द ऐसे निकलने लगे जैसे कोई बाँध टूट गया हो, "वीर का मैसेज आया था कल रात करीब 11 बजकर  25 मिनट पर, हाय सीमा आई एम वीर तो मैने भी रिप्लाई कर दिया, दो बाते हुईं फिर गुड नाईट बोल दिया, मैं समझ ही नही पाई उसने क्यों किया मैसेज।" नेहा अभी भी घूर रही थी और घूरते-घूरते बोली, "तू सच बोल रही ना, कहीं तेरा उससे चक्कर तो नही चालू हो गया।" मैंने उसे समझा तो दिया कि ऐसा कुछ नही है पर नेहा को शायद पूरा यकीन नही हुआ इसलिए उसने मेरा हाथ पकड़ा और एक लड़की के पास ले गई, और उससे बताने के लिए कहा कि वीर ने क्या किया था। उस लड़की ने बताया कि वीर उससे बात करता था, "रोमांटिक बाते भी हो जाती थी लेकिन उसने कभी प्रपोज़ नही किया था तो मैंने सोचा मैं ही कर देती हूँ, क्योंकि वो पसन्द था मुझे। मैं उससे मिली मैने बाकायदा एक गुलाब का फूल देकर उससे बॉयफ्रेंड बनने को कहा, वो मना करता बुरा मुझे तब भी लगता बट विल यू बिलीव इट वो अचानक भाग गया, लिट्रली, भाग गया, और तब से उसने मुझसे बात ही नही की।" यह सुनकर मैं तो चुप थी लेकिन नेहा बोली, सुन लिया ? अब भी कोई इंट्रेस्ट बाकी हो तो मरो, आई डोंट केयर। मैं कुछ कह पाती उससे पहले वो लड़की फिर से बोली, "पर यह तुम्हारी बेस्टफ्रेंड है ना तो इसे तुम पर भरोसा नही है जो मेरे पास लाई हो, तुम्हारे साथ भी तो उसने यही किया था, मुझे लगता है वो सबके साथ यही करता है, उसे मज़ा आता है लड़कियों से यह मज़ाक करने में।" 
मैं अब भी कुछ नही बोली और वहाँ से चल दी, नेहा एकदम से रोकने लगी, समझाने लगी ऐसा था और वैसा था। मैंने उसकी कोई बात नही सुनी और सीधे जाकर क्लास में बैठ गई। लेक्चर पर लेक्चर गुज़र गए मैंने बात नही की। कॉलेज पूरा होने के बाद वो मेरे पास आई, उससे पहले वो कुछ बोलती मैं बोली, "मुझे कोई सफाई नही चाहिए लेकिन अब मेरी जो मर्ज़ी होगी वो करूँगी, रोकने की कोशिश भी ना करना।" वीर को तो आज मैंने सही से नोटिस भी नही किया, बड़ा बुरा फील हो रहा था पूरे दिन तब ही मुझे ख़लील जिबरान की वो बात याद आयी जो उन्होने अपनी किताब 'द प्रोफेट' में लिखी थी, "हमारी खुशी और ग़म की वजह दरअसल एक ही होती है। जिस वजह से आज हम खुश हैं उसी वजह से कल दुखी थे और जिस वजह से आज दुखी हैं उसी वजह से कल खुश थे।" नेहा अब तक मेरी खुशी की वजह हुआ करती थी आज उसी की वजह इतना बुरा लग रहा है, पर अब वक्त नेहा के बारे में सोचने का नही वीर से बात करने का है। मुझे लगा था मैं उसे मैसेज करूँगी पर मैने कॉल कर दी। अजीब बात है ना कि जब हमारे साथ कुछ अनऐक्सपेकटेड होता है तो हम भी कुछ अनऐक्सपेकटेड करते हैं। फिलहाल मैंने कॉल तो कर दी लेकिन बात क्या करना थी पता नही। हाल-चाल पूछा और चुप, पाँच सेकेण्ड तक शान्ति बनी रही फिर वो बोला, "मैं कई दिन से तुमसे बात करने की कोशिश कर रहा था पर वो नेहा हर वक्त तुम्हारे साथ रहती है और आज तो बैक टू बैक लेक्चर की वजह से..." "कल मिलती हूँ मैं तुमसे" उसको बीच में टोकते हुए मैंने कहा और फोन रख दिया। मुझे यकीन नही हुआ कि मैंने यह बोला और पागल इतनी हूँ कि उसका जवाब भी नही सुना। खैर लेकिन अब बस नींद आ जाए ताकि कल हो सके और कल मिलना हो सके।
अगले दिन कॉलेज में हम दोनो मिले। मेरे समझ ही नही आया कि क्या बोलूँ तो मैंने पूछ लिया हाँ तो क्या बात करना थी आपको, और यह बोलकर मन हुआ अपना सर दिवार पर दे मारूँ, यह कौन सा तरीका है बात शुरू करने का। लेकिन उसका जवाब सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा, वो बोला, "नही अरे वो मतलब कोई खास ज़रूरी बात नही करना थी, बस बात करना थी।" मैं इसका मतलब तो समझ गई लेकिन फिर भी अनजान बनकर मैंने मतलब पूछ लिया। यहाँ से हमारी बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। कभी कैफे, कभी चैट, कभी कॉल और कुछ वक्त बाद विडियो कॉल भी हो गई। लड़का-लड़की के बीच जैसी बाते होनी चाहिए थोड़ी वैसी बाते भी हुईं लेकिन अभी तक हमारे इस रिश्ते का कोई नाम नही था। किसी ने किसी को प्रपोज़ नही किया था। और हाँ क्या मैंने नेहा के बारे में बताया, उससे मेरी बात होती है पर वैसे नही जैसे पहले होती थी। वो एक दिन मुझसे बोली थी, "देख लेना जब तुम उसे प्रपोज़ करोगी तो वो वही करेगा जो अब तक करता आया है।" तो मैेने भी कह दिया कि "रिश्ते को नाम देने की ज़रूरत ही क्या है, जो मुझे चाहिए मेरे पास है, मैं उससे प्यार करती हूँ इतना काफी है।" "प्यार, हाँ? यह उससे कह कर देखना" वह बोली।
दो महिने हो गए बात करते-करते लेकिन इस रिश्ते को अभी तक कोई नाम नही मिला था, मैं अब तक ठीक थी पर अचानक उसे अपना बॉयफ्रेंड बोलने का दिल करने लगा था। या कहूँ कि डर लगने लगा था कि कहीं कोई और ना आ जाए उसकी ज़िन्दगी में। लड़के तो इतना इंतज़ार नही करते, प्रपोज़ कर देते हैं, तो इसे क्या है, आज तक उसने मुझे ऐसे वैसे टच भी नही किया, तो यह भी नही कह सकते कि फायदा उठाना चाहता है वरना लोग तो उसके लिए बॉयफ्रेंड बन ही जाते है, यह लड़का चाहता क्या है? क्या करूँ, कुछ बोलूँ उससे, पर कहीं उसने सचमुच वही किया जो नेहा कह रही है तो? फक, वॉट डू आई डू। कुछ समझ नही आ रहा।
दिन तो सही गुज़र रहे थे लेकिन रातों में ऐसे ख्याल ज़्यादा आते थे, उन्ही में से एक रात मैंने उसे मैसेज किया, "वीर, तुम मुझे हमेशा से बहुत पसन्द हो, पर समझ नही आता तुम्हे कहूँ क्या, मेरे दोस्त भी पूछ रहे थे कि क्या वीर तुम्हारा बीएफ है, तो तुम बताओ क्या मैं उनसे बोल दूँ कि हाँ वीर मेरा बॉयफ्रेंड है?" मैसेज सीन हुआ लेकिन रिप्लाई नही आया। यह पहली बार था कि उसने रिप्लाई ना किया हो, दिमाग़ में हज़ार बाते घूमने लगीं, मुझे रोना सा आने लगा, नेहा की बात अचानक सच लगने लगी, घबराहट होने लगी। उस रात की सुबह होने में एक ज़माना लग गया।
सुबह होते ही तैयार होकर मैं कॉलेज पहुँच गई। वीर तो अपने वक्त पर ही आया, मैं उसे पकड़ कर कैफे ले गई, वो कहता रहा क्लास ज़रूरी है और यह वो, मैंने सब इग्नोर किया उसे अपने सामने बैठाकर पूछा, "टेल मी, यह हमारे बीच क्या है? क्या तुम मेरे लिए सीरियस हो या नही? तुम मेरे बॉयफ्रेंड हो या नही, सब क्लियर करो अभी।" वो कुछ नही बोला, मैं बहुत गुस्से में थी, दिमाग़ में नेहा की बात चले जा रही थी, मैंने सोच रखा था अगर इसने भागने की कोशिश करी तो इसको सर फोड़ दूँगी। प्यार करती हूँ, इसीलिए इतना गुस्सा भी आ रहा है। बोला तो वो अब भी कुछ नही था बल्कि बुरी तरह कँपकपा रहा था। उसका हाथ मेरे हाथ में था, वो पसीने में लतपत होता जा रहा था। मैं घबरा गई मैंने उससे पूछा, "क्या हुआ बिमार हो क्या, सॉरी मैंने इतना गुस्सा कर दिया।" मेरी पकड़ ढीली हो गई थी उसी का फायदा उठाकर उसने हाथ छुड़ाया और चल दिया,और हाँ, हाँ बिल्कुल वही जिसकी उम्मीद थी, वो भागने लगा, पर मैंने भी हार नही मानी मैं उसके पीछे भागी। वो जाकर एचओडी के आॉफिस में घुस गया, मैं बाहर उसका वेट करती रही वो दो मिनट में निकला और जाने लगा, और कॉलेज के बाहर चला गया। मैने उसको रोकने की कोशिश करी लेकिन वो नही रुका। सामने से नेहा आ रही थी, वो समझ गई क्या हुआ है, उसने आते ही एक सच्चे दोस्त का फर्ज़ पूरा किया और एक अच्छा सा ताना मारा, "क्या हुआ, तुम्हारा प्यार झेल नही पाया बेचारा, फ्रिक ना करो वो किसी का प्यार नही झेल पाता।" मैं किसी तरह के पंगे के मूड में नही थी मुझे बस पता लगाना था कि यह चल क्या रहा है। तभी एचओडी बाहर आ गए, मैंने वीर के बारे में उनसे पूछा तो वो बोले, "उसकी तबियत बहुत ज़्यादा खराब हो गई थी अचानक, बोल भी नही पा रहा था सही से इसलिए मैेने उसे जाने दिया।" गुस्सा तो इतना आ रहा था कि मन हुआ उसके पीछे जाऊँ और थप्पड़ ही थप्पड़ लगाऊँ लेकिन उसकी हालत पर थोड़ा तरस भी आ रहा था इसलिए रुक गई। रात गुज़रने में तो बस एक ज़माना लगा था, दिन गुज़रने में तो एक ज़िन्दगी लग गई।
आखिर घर पहुँच कर मैंने मैसेज करना चाहा, तब तक मेरा दिमाग़ भी थोड़ा शान्त हो गया था। मैंने चैट खोली और टाईप करना शुरू किया, "क्या हुआ है वीर, प्लीज़ टेल मी, टेल मी क्लियरली, तुम मुझसे प्यार करते हो या नही, क्योंकि मैं तो करती हूँ, और..." मैं पूरा टाईप भी नही कर पायी थी कि उसका मैसेज आया, "मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ सीमा, मुझे माफ कर दो मैं ऐसे चला आया पर मेरे साथ कुछ प्रोब्लम है, शायद मैं बीमार हूँ, मुझे खुद नही पता क्या पर कुछ तो है, अगर तुम्हे मुझ पर यकीन है तो प्लीज़ मुझे कुछ वक्त देदो, आई वाना बी विद यू बट आई नीड टाईम।" मैंने मेसेज पड़ा और मोबाईल साइड में रख दिया। कुछ भी समझ नही आ रहा था। दिमाग़ में कुछ भी चल रहा था, "मालूम है लड़के तरह तरह के बहाने बनाते हैं लेकिन यह क्या है? बहाना ऐसा तो बनाओ जिस पर भरोसा हो, बीमारी है कुछ, क्या बीमारी है? उसने यकीन की बात कही लेकिन मैं यकीन किस बुनियाद पर करूँ। वक्त चाहिए, कितना वक्त चाहिए? पर अब मैं कुछ नही पूछने वाली, कुछ नही जानना मुझे। भाड़ में जाए। शायद इतनी ही थी हमारी कहानी।"
अगले दिन वो आया भी नही, और मैंने महसूस किया कि मुझे उतना भी बुरा नही लग रहा था पर हाँ मेरा दिमाग़ खराब सा था, गुस्सा था। नेहा तो पता नही क्या-क्या बोलेगी कितने ताने मारेगी यह सोचकर मैंने एक ऐसा कदम उठाया जो शायद उस वक्त मेरे लिए सही था। लड़कियों को तो प्रपोज़ल मिलते ही रहते हैं उन्ही में से एक मेरे पास पेंडिंग पड़ा था मैं उसके पास गई और मैंने कहा, "आई ऐक्सेप्ट इट।" मेरा बस इतना कहना था कि वो बहुत खुश हो गया। वैसे सच कहूँ तो सिर्फ नेहा के तानो की बात नही है मैं वीर को भी दिखाना चाहती थी कि मैं अकेली नही हूँ। ध्रुव नाम है मेरे बॉयफ्रेंड का और उससे रिलेशन में आकर महसूस हुआ कि दरअसल वीर से वो सिर्फ अट्रेकशन था और वो भी बस उसके खूबसूरत चेहरे की वजह से। मुझे डर था कि वो वापस आकर कुछ बकवास ना करे और मुझसे कुछ ना बोले और थैंकस् टू गॉड वो बोला भी नही।

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