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दृष्टिकोण- पार्ट 3

Disclaimer

यह एक series की पहली कहानी का आखिरी Part है। Series होते हुए भी हर कहानी को अलग-अलग पढा जा सकता है तथा हर कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।

                            बलाॉगरस्

मेरा नाम ज़रूरी नही है, क्योंकि यह कहानी मेरी नही है। बस इतना जान लीजिए कि मैं एक प्राइवेट यूनीवर्सिटी में प्रोफेसर हूँ, कम्यूनीकेशन पढ़ाता हूँ। मैं हर बार बच्चो को एक ब्लॉग मेन्टेन करने के लिए कहता हूँ, बनवा भी देता हूँ पर लिखता कोई नही वो बात अलग है। पिछले साल जो सेशन शुरू हुआ उसमें भी मैंने बच्चो से यही कहा था, हालाँकि मुझे पता था इस्तेमाल कोई नही करने वाला। इस बार मगर चमत्कार हो गया, पहली बार कुछ बच्चो ने ब्लॉग लिखा।
एक शाम ब्लाॉग की लिस्ट पर मेरी नज़र पड़ी तो सोचा देखता हूँ खोलकर, शुरूआत में तो कुछ नही था पर बाद में एक ब्लाग मिला 'माई_व्यू' नाम का उसमें कुछ शायरियाँ लिखी थी। मुझे यह देखकर काफी खुशी हुई कि किसी ने कुछ तो लिखा, उसके बाद दो और थे जिनमें कुछ लिखा था पर कुछ खास नही। फिर एक ब्लॉग 'आई_एम_लिमिटलेस' नाम का मिला, उसमें काफी कुछ लिखा था। मैं हैरान था देखकर कि किसी ने वक्त निकाल कर इतना कुछ लिखा। मैंने पढ़ना शुरू करा तो पता चला कि यह सीमा नाम की स्टूडेंट ने लिखा है अपनी लव लाईफ के बारे में। यह पढ़ कर मुझे इतना कुछ स्पेशल नही लगा था जब तक मुझे एक और ब्लॉग नही मिला, जिसका नाम 'वीर_द_डूड' था। वीर सीमा के ब्लॉग में था और वीर के ब्लॉाग में सीमा थी। दोनो ने एक ही कहानी अपने-अपने नज़रियों से लिखी थी।
अगले दिन मैंने कॉलेज में सीमा को अपने केबिन में बुलाया और उससे कहा, "मैंने तुम्हारा ब्लॉग पड़ा, मुझे काफी खुशी हुई इस बात की कि तुमने मेरी बात मानी और लिखा। मुझे पता है यह तुम्हारा पर्सनल मैटर है पर फिर भी मैंने सोचा पूछ लूँ अगर मैं तुम्हारी किसी तरह से मदद कर पाऊँ तो बताओ।" "मदद, कैसी मदद सर, किस मामले में?" उसने हैरानी से पूछा, तो मैंने कहा, "यही वीर के बारे में, तुम उससे प्यार करती हो ना पर तुम लोगो के बीच गलतफहमी हो गई।" मुझे पता था मेरा यह सब कहना शायद सही नही था अपनी स्टूडेंट से पर पता नही क्यों मुझे दोनो की स्टोरी पढ़ कर बड़ा बुरा सा लगा तो मन हुआ कुछ ठीक कर सकूँ तो कर दूँ। "अरे सर, आपने वो सब सीरियस ले लिया, ऐसा कुछ नही था बस क्रश था मुझे, पहली बार देखा कोई लड़का ऐसी हरकतें करता हो अजीब सा लगा मुझे, तो मैंने सोचा इसको तो ब्लॉग पर डालू एक स्टोरी की तरह तो व्यूज़ आ जाएँ शायद", वो बोली। फिर मैंने उससे पूछा कि जो लिखा है वो सब सच तो है ना तो उस पर वो बोली, "नही सब तो नही है, थोड़ा मसाला तो ऐड करना पड़ता है व्यूज़ के लिए, वरना डिट्टो लिख देती तो बोरिंग हो जाती ना स्टोरी, जैसे वो चैट खुली थी मैसेज सीन हो गया, यह लोगो के साथ होता है इसलिए लिखा ताकि लोग रिलेट करें, लोगो को वो ज़्यादा पसन्द आता है जिससे वो रिलेट कर पाएँ बल्कि मैं तो उस दिन उसे मैसेज करने ही नही वाली थी जिस दिन उसका मैसेज आया, और नेहा की बात जो उस लड़की ने बातो बातो में बता दी वो मैंने अपने पास से लिखा सच तो यह है कि नेहा ने अपने आप मुझे बताया था पर यह लिखती तो कोई फन नही आता ना।"
मैं वीर के ब्लॉग के बारे में उसे बताना चाहता था पर यह सब सुनकर मैंने कुछ नही कहा बस उसके लिखने की कला की तारीफ करके जाने को कह दिया।
मैं ऐसे ही वीर से भी बात करना चाहता था पर सीमा की बाते सुनकर लगा कहीं उसने भी यही तो नही किया है लेकिन एक चान्स लेते हुए रीसेस में मैंने वीर को बुलाया। वीर से जब मैंने पूछा तो उसने हिचकिचाते हुए सब बताया कि, "हाँ वो जो कुछ लिखा है सच लिखा है, यह सब जब हुआ तो मुझे किसी से बात करना थी अपने दिल की बात कहना थी पर मुझे मालूम था कोई नही समझेगा इसीलिए मैंने ब्लॉग पर लिखा मजबूरी में, वो मैंने किसी के लिए नही अपने लिए लिखा है। मुझे सीमा पसन्द थी, आई मीन है, पर क्या फायदा, आपने तो पढ़ा ही कि क्या हुआ, वो मेरे लिए शायद वो फील नही करती जो मैं करता हूँ इसीलिए उसने मेरा वेट नही किया।" यह सब सुनने के बाद मैंने उसे सीमा का बलॉग पढ़ाया और यह भी बताया कि आज मैंने उससे बात की तो वह क्या बोली। यह सब जानकर वीर को बहुत बुरा लग रहा था उसका चेहरा बता रहा था, मुझे भी गिल्टी फील हुआ कि बेकार में मैं क्यों इसकी तकलीफ बढ़ा रहा हूँ पर फिर भी मैं यह सब कर रहा था। "क्या पता जो उसने लिखा है वो झूठ है या आपसे जो कहा वो झूठ है" यह बोलकर वीर चला गया। अब मैं कन्फयूज़ हो गया था, सीमा को वीर की प्रोब्लम बताना ज़रूरी है या नही, इससे कोई फर्क पड़ेगा या नही।मुझे वीर से हमदर्दी हो रही थी पर इस हमदर्दी का कोई फायदा नही अगर मैं उसकी मदद ना कर पाऊँ। मेरे ध्यान में आया कि नेहा से बात करता हूँ वो बता देगी कि सीमा की कौन सी बात सच है पर अगले ही पल लगा कि क्यों मैं इन बच्चो की ज़िंदगी के चक्कर में पड़ रहा हूँ और फिर अपने काम में व्यस्त हो गया।
बच्चो की छुट्टी हुई तो थोड़ा फ्री टाईम मिला तो मैंने सोचा कैफे हो आता हूँ रास्ते में वीर दिखा, वो बहुत उदास लग रहा था तो मुझसे रहा नही गया तो मैंने पूछ लिया क्या हुआ। वो बोला, "क्या बताऊँ सर, रहने दीजिए" मेरे दोबारा ज़ोर देकर पूछने पर उसने बताया, "मेरी तो ज़िंदगी अजीब है, आज मेरी एक जूनियर ने मुझे प्रपोज़ किया, और फिर वही सब, आपको तो पता ही है।" "अरे बेटा, काश मैं तुम्हारी कुछ मदद कर पाता" मैं बोला। "रहने दीजिए सर, शायद पिछले जन्म के किसी कर्म का फल मिल रहा है मुझे, फिलहाल मैं चलता हूँ, बस जाने वाली है।" इतना कहकर वो बस की तरफ चला गया। मैं कैफे की तरफ बड़ा और सोचने लगा कि कुछ तो करना पड़ेगा, ऐसे इस लड़के को छोड़ दिया तो यह तो सुसाइड तक पहुँच सकता है, इसकी मदद करना ज़रूरी है।
अगले दिन मैंने सीमा को फिर से बुलाया और उससे बात की, आज मैंने उसे वीर का ब्लॉग पढ़ने को दिया। वो पढ़ कर कुछ नही बोली, शायद किसी सोच में डूब गई तो मैंने ही कहा,"देखो बेटा वो तुमसे प्यार करता है, उसे तुम्हारी ज़रूरत भी है, तुम उसके साथ होगी तो वो इस फोबिया को हराकर आगे बड़ पाएगा।" इस पर वो बोली, "देखिए सर, पहली बात, आपको पता है कि मैं अब ध्रुव के साथ हूँ, मैं उसको धोखा नही दे सकती, और दूसरी बात मैं यह नही कर पाऊँगी मुझसे यह नही हो पाएगा, यह कोई मूवी नही है सर जिसमें लोग दूसरे इन्सान के लिए पूरी ज़िंदगी लगा देते हैं, और क्या गैरेंटी है कि वो ठीक होगा ही।" मुझे उसकी बात सुनकर यह अहसास तो हुआ कि हाँ यह हकीकत है और हकीकत में लोग अपने लिए जीते हैं पर फिर भी मैंने कहा, "पर क्या बेटा तुम्हे अच्छा नही लगेगा कि तुम किसी के काम आ गईं..." मैं इसके आगे कुछ बोल पाता उससे पहले ही वो मुझे टोकते हुए बोली, "मैं यह कहना नही चाहती थी पर सर, आप हमारे टीचर हैं हम आपकी इज़्ज़त करते हैं पर प्लीज़ आप हमारे पर्सनल मैटर हमें हैंडल करने दीजिए, और आप भी क्यों सोच रहे हैं वीर के बारे में, जाने दीजिए।"
वो तो चली गई, पर मैं उसकी कही हुई बात सोच रहा था, मुझे बुरी नही लगी उसकी बात, उसने जो कहा अपने हिसाब से सही कहा पर मैं उसे क्या बताऊँ कि मैं क्यों सोच रहा हूँ वीर के बारे में, मैं क्या बताऊँ उसे कि वीर ने अपने ब्लॉग में जिस 40 साल के आदमी का एक ज़रा सा ज़िक्र किया है वो मैं हूँ, क्या बताऊँ कि वो 40 साल का इन्सान अब 43 का है और आज भी अकेला है। इलाज उस इंसान का भी हो सकता था पर कोई था ही नही जिसके लिए इलाज कराया जाता, उसे भी कोई छोड़ गया था, उसका भी  दिल और हिम्मत सब टूट गया था। वो तो बस अपने घर वालो के ज़बरदस्ती करने पर डॉक्टर के पास गया था, ठीक होने के बहुत तरीके थे टॉक थैरेपी, हिप्नोथैरेपी, बिहेव्यिर थैरेपी और जाने क्या-क्या पर उसको ठीक कोई नही कर पाया क्योंकि उसको किसी ने अन्दर से खराब कर दिया था। उस इन्सान ने सुसाइड तो नही की लेकिन सही से ज़िन्दा भी नही बचा। यही बेचारे इस बच्चे के साथ हो रहा है, मैं यह नही होने दे सकता इसके साथ।
मैं रात में लेटा सोच रहा था कि क्या किया जा सकता है, कैसे इस बच्चे की मदद की जा सकती है, क्या इसके घर वालो को बता देना सही होगा, या कुछ और किया जाए तो मुझे ख्याल आया कि मेरे साथ तो ऐसा नही था पर इस लड़के को तो कितनी लड़कियाँ पसन्द करती हैं तो उनमें से कोई ऐसी ज़रूर होगी जो समझेगी, बस एक साथ मिल जाए बच्चे को बाकि तो सब ठीक हो सकता है। शायद मुझे कहीं अन्दर यह भी पता था कि यह बेवकूफी है पर उसको इस डर से निजात दिलाने का जाने क्या फितूर सवार था कि मुझे सही गलत समझ नही आ रहा था। अब बस उन लड़कियों का पता लगाना था जो वीर को प्रपोज़ कर चुकी हैं, लेकिन मुझे नही पता था कि किस्मत में लिखा तो वही है जो मैं चाहता हूँ पर दूसरी स्याही से।
अगले दिन कॉलेज पहुँच कर मैं कॉरिडोर से गुज़र रहा था तो कानो में आवाज़ पड़ी, "अरे तुमने वीर का ब्लाॉग पढ़ा? पता नही सच है या झूठ पर अगर सच है तो बड़ा खराब मामला है यार।" मैंने मुड़ कर देखा तो दो लड़कियाँ खड़ी बात कर रही थी, मुझे हैरानी हुई पर मैं रुका नही। आज वीर के क्लास में पहला लेक्चर मेरा ही था, पर वीर आज नही आया था। वहाँ क्लास में जाकर भी ऐसा ही कुछ सुनने में आया तो पता क्या चलता है कि वीर का ब्लॉग पूरे क्लास में फैल चुका है, लगभग सब पढ़ चुके हैं और अब उस पर चर्चा हो रही है। मैंने अंजान बनते हुए पूछा, "यह किसके ब्लॉग की बात हो रही है?" तो एक लड़का बोला, "अरे सर वो वीर ने एक ब्लॉग लिखा है, उसमें उसने अपने एक फोबिया की बात लिखी है वही सब बात कर रहे थे, हम लोग ने तो सुना भी नही कि ऐसा कुछ होता है।" एक लड़की बोली, "अरे सर उसमें यह लिखा है कि वीर को कमिट्मेंट का फोबिया है, उसी की वजह वो परेशान था, मैंने कहीं पढ़ा तो था इसके बारे में पर ज़्यादा डिटेल में नही।" दूसरी लड़की बोली, "क्या आपको पता है सर कुछ इस फोबिया के बारे में ? ऐसे इन्सान की कैसे मदद की जा सकती है?" तो मैंने कहा, "हाँ थैरेपी लेकर ठीक हो तो सकता है पर इसमे एक साथ की ज़रूरत होती है, बिना सपोर्ट के यह बहुत ज़्यादा मुश्किल है, या तो वो इन्सान जिसे यह फोबिया है वो इतना ज़्यादा हिम्मतवाला हो कि अकेले कर पाए।" एक और लड़का बोला, "बाकी तो सच है सर हमे भी पता है पर यह फोबिया वाली बात मुझे लगता है बस उसने ब्लॉग को चटपटा बनाने के लिए लिखी है, या शायद सिम्पिथी गेन करने के लिए।" मैं समझ गया था कि यह सीमा की ही कारस्तानी है, उस ही ने यह ब्लॉग फैलाया है तो मैंने सीमा से पूछा, "सीमा तुम्हे क्या लगता है अगर यह सच है तो कोई उसका साथ देगा?" सीमा बोली, "साथ तो दे सकता है कोई पर खुद की खुशियाँ भूलकर या अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर आकर नही, यहाँ इतनी लड़कियाँ बैठी हैं किसी से पूछ लीजिए और सिर्फ लड़कियों से क्यों लड़को से भी पूछिए कि अगर किसी लड़की को यह प्रोब्लम होगी तो वो खड़े होंगे? कितना इंतज़ार कर पाएँगे?" मैं बोलता उससे पहले बच्चे बोलने लगे, "हाँ बात तो सही है, किसी के लिए इतना डेडीकेटेड कोई तब ही हो सकता है जब कहानियों वाला प्यार हो।" किसी ने जिंदगी को किसी पर खर्च करने के लिए छोटा बताया तो किसी ने अपने डरो से लड़ने की सीख दी, कोई मज़ाक करने लगा तो किसी ने इतनी कड़वी सच्चाई बोली कि दोनो को सुनकर गुस्सा आ जाए। सबकी बाते सुनकर लगा कि अच्छा ही है आज वीर नही आया वरना जाने क्या हाल होता उसका। अब मेरे हाथ में सिर्फ एक चीज़ थी तो वही मैंने कहा, "आज बात करनी है कर लो पर वीर के सामने कोई ऐसी बात ना बोलना, किसी की परेशानी दूर नही कर सकते तो बढ़ाना भी मत।" सबने बात से इत्तेफाक रखा और पढ़ाई में लग गए।
जब मुझे वक्त मिला तो मैं अपने केबिन में आकर बैठा। वो सब सुनकर ऐसा लगा था जैसे वो वीर के लिए नही बल्कि मेरे लिए ही कहा गया हो। सही तो कहा था बच्चो ने इंसान को अपने डर से खुद लड़ना पड़ता है, यहाँ कोई साथ नही देता, और क्यों दे कोई साथ, सब अपने लिए आये हैं इस दुनिया में, दूसरो की ज़िंदगी सुधारने थोड़ी आए हैं, मुझे भी खुद करना चाहिए था पर नही किया मैंने, वीर को भी जो करना है खुद करना पड़ेगा, मैं कुछ नही कर सकता कोई कुछ नही कर सकता। अचानक सीमा की आवाज़ आई, "सर, मे आई कम इन?" मैंने उसे अन्दर बुलाया, वो बस यह बताने आयी थी कि वीर का ब्लॉग उसने जानबूझ कर नही फैलाया, उसने तो बस अपनी दो करीबी दोस्तो को भेजा था   और उनसे यह कहना भूल गई कि सिर्फ खुद पढ़ना आगे ना भेजना, उन लोगो ने फॉरवर्ड कर दिया। मैंने उसे समझाया, "जो होता है अच्छे के लिए होता है, तुम फिक्र ना करो, तुमने सही किया और सही कहा कि कोई खुद की खुशियाँ दाँव पर लगा कर किसी का साथ नही दे सकता, बस अब एक बात का ख्याल रखना कि उसे क्लास से कुछ सुनने को ना मिले।" उसने हाँ में हाँ मिला दि, फिर मैंने उससे पूछा कि यह सब जानकर ध्रुव ने कुछ नही कहा तो वो बोली, "वीर के ब्लॉग में तो ऐसा कुछ था नही और मैंने जो ध्रुव के बारे में लिखा था वो बदल दिया ताकि हमारा रिश्ता बना रहे।" मुझे हँसी आ गई और वो चली गई।
सीमा के जाने के बाद मैंने वीर को मैसेज किया, "वीर, हम इस दुनिया में अकेले आते हैं और अकेले ही जाते हैं, कुछ लोगो को चंद दिन के लिए कोई मिल जाता है कुछ लोगो को नही मिलता पर ज़िंदगी इससे कहीं ज़्यादा है बेटा, हमे अपने लिए जीना आना चाहिए, सुबह उठने की वजह ज़रूरी नही है कोई और हो, मुस्कराने की वजह ज़रूरी नही किसी और को ही बनाया जाए, ज़रूरी नही अपने डरो को दूसरो के लिए हराया जाए। यू कैन डू इट, आॉल द बेस्ट।"

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